Etawah Assembly Seat: कभी कांग्रेस का गढ़, फिर सपा का दबदबा और अब BJP का कब्जा, 2027 से पहले जानें पूरा चुनावी इतिहास

Etawah Assembly Seat: कभी कांग्रेस का गढ़, फिर सपा का दबदबा और अब BJP का कब्जा, 2027 से पहले जानें पूरा चुनावी इतिहास

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इटावा का नाम हमेशा से खास रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जब राज्य की 403 सीटों पर राजनीतिक समीकरणों की चर्चा शुरू हो चुकी है, तब इटावा विधानसभा सीट का इतिहास भी काफी कुछ बताता है। यह सीट लंबे समय तक कांग्रेस के प्रभाव में रही, बाद में जनसंघ और जनता पार्टी ने भी यहां जीत दर्ज की। 1990 के दशक में भाजपा और सपा की एंट्री के साथ मुकाबले का स्वरूप बदला और पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा ने लगातार जीत दर्ज की।

इटावा जिले में कुल तीन विधानसभा सीटें हैं—इटावा, जसवंतनगर और भरथना। इनमें इटावा विधानसभा सीट का गठन 1952 में हुआ था और उसी साल यहां पहला चुनाव भी हुआ। शुरुआत में इसका नाम इटावा दक्षिण था। बाद में परिसीमन के साथ इसका स्वरूप बदला और सीट को इटावा विधानसभा के नाम से जाना जाने लगा।

1952 से शुरू हुआ सफर, कांग्रेस ने खोला जीत का खाता

इटावा विधानसभा सीट के पहले चुनाव में कांग्रेस के गोपीनाथ दीक्षित विधायक चुने गए। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार सुरेंद्र सिंह को हराया। इसके बाद 1957 में पहली बार भारतीय जनसंघ ने इस सीट पर जीत दर्ज की। जनसंघ के भुवनेश भूषण ने कांग्रेस के हकीम हाजिक को 755 वोटों से हराया।

हालांकि जनसंघ का यह प्रभाव लगातार नहीं रहा। 1962 में कांग्रेस ने फिर वापसी की। होतीलाल अग्रवाल ने भुवनेश भूषण को 3,017 वोटों से शिकस्त दी। 1967 में जनसंघ के भुवनेश भूषण ने दोबारा जीत हासिल की और कांग्रेस के होतीलाल अग्रवाल को 6,872 वोटों से हराया।

1969 में फिर तस्वीर बदली। कांग्रेस के होतीलाल अग्रवाल ने जनसंघ के भुवनेश भूषण शर्मा को 6,031 वोटों से हराया। इसके बाद 1974 में कांग्रेस ने लगातार दूसरी जीत दर्ज की। इस बार सुखदा मिश्रा विधायक बनीं। उन्होंने भुवनेश भूषण को 10,467 वोटों से हराया।

1977 में जनता पार्टी की एंट्री, फिर कांग्रेस की वापसी

1974 के बाद देश में आपातकाल का दौर आया। 1977 में विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस को बड़ा झटका लगा और जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई। इसका असर इटावा सीट पर भी दिखा।

1977 के चुनाव में जनता पार्टी के सत्यदेव त्रिपाठी ने जीत हासिल की। उन्होंने कांग्रेस की सुखदा मिश्रा को 12,274 वोटों से हराया। त्रिपाठी को 36,260 वोट मिले, जबकि सुखदा मिश्रा के खाते में 23,986 वोट आए।

लेकिन यह बदलाव स्थायी नहीं रहा। 1980 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सुखदा मिश्रा ने फिर जीत दर्ज की। उन्होंने जनता पार्टी (सेक्युलर) के जदुनाथ सिंह तोमर को 25,088 वोटों के बड़े अंतर से हराया। इसके बाद 1985 में भी सुखदा मिश्रा कांग्रेस के टिकट पर विजयी रहीं।

1989 में उन्होंने पार्टी बदली और जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ा। इसके बावजूद उनकी जीत का सिलसिला नहीं टूटा। उन्होंने कांग्रेस के अतुल कुमार दुबे को 20,300 वोटों से हराया। इस तरह 1980, 1985 और 1989 में लगातार तीन चुनाव जीतकर सुखदा मिश्रा ने अपनी मजबूत पकड़ दिखाई।

1991 के बाद बदला सियासी गणित, सपा ने भी बनाई जगह

1989 के बाद इटावा सीट पर राजनीतिक मुकाबला और दिलचस्प हुआ। 1991 में भाजपा ने पहली बार यहां जीत दर्ज की। अशोक दुबे ने जनता पार्टी के जयवीर सिंह को 15,595 वोटों से हराया।

1993 में समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर पहली बार जीत का स्वाद चखा। जयवीर सिंह भदौरिया ने भाजपा के अशोक दुबे को 8,716 वोटों से हराया। लेकिन 1996 में भाजपा ने फिर वापसी की। इस बार जयवीर सिंह भदौरिया भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे और उन्होंने सपा के सत्य नारायण दुबे को 17,611 वोटों से हरा दिया।

इसके बाद 2002 और 2007 के चुनावों में सपा का दबदबा देखने को मिला। 2002 में महेंद्र सिंह राजपूत ने भाजपा के जयवीर सिंह भदौरिया को 4,030 वोटों से हराया। 2007 में भी महेंद्र सिंह राजपूत ने सपा के टिकट पर जीत दोहराई। इस बार उन्होंने बसपा के नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी ‘बल्लू’ को 13,065 वोटों से हराया।

2009 में इस सीट पर उपचुनाव भी हुआ। 2007 में विधायक बने महेंद्र सिंह राजपूत ने लोकसभा चुनाव के दौरान सपा छोड़कर बसपा का दामन थाम लिया और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद नवंबर 2009 में हुए उपचुनाव में उन्होंने बसपा के टिकट पर दोबारा जीत हासिल की।

2012 में सपा की वापसी, 2017 से भाजपा का लगातार कब्जा

2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने फिर अपना प्रभाव कायम किया। रघुराज सिंह शाक्य ने बसपा के महेंद्र सिंह राजपूत को 6,264 वोटों से हराया। उन्हें 74,874 वोट मिले, जबकि महेंद्र सिंह राजपूत को 68,610 वोट मिले।

लेकिन 2017 में प्रदेश की बदली राजनीतिक हवा का असर इटावा सीट पर भी पड़ा। भाजपा की सरिता भदौरिया ने सपा के कुलदीप गुप्ता ‘संतु’ को 17,342 वोटों के अंतर से हराया। सरिता भदौरिया को 91,234 वोट मिले और कुलदीप गुप्ता को 73,892 वोट मिले।

2022 में भाजपा ने इस सीट पर लगातार दूसरी जीत दर्ज की। सरिता भदौरिया ने सपा के सर्वेश कुमार शाक्य को 4,277 वोटों से हराया। भाजपा उम्मीदवार को 98,150 वोट मिले, जबकि सपा उम्मीदवार के खाते में 94,166 वोट आए।

इटावा के सामाजिक समीकरण की बात करें तो उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 14% बताई गई है। यादव करीब 12%, शाक्य-कुशवाहा-काछी करीब 11% और अनुसूचित जाति के मतदाता करीब 10% बताए गए हैं। अल्पसंख्यक समुदाय की हिस्सेदारी करीब 9%, पाल-गड़रिया-बघेल करीब 8% और राजपूत करीब 6% हैं। वैश्य-बनिया-कायस्थ करीब 5% तथा कोरी-शंखवार करीब 3% बताए गए हैं।

यानी 2027 से पहले इटावा की कहानी सिर्फ भाजपा बनाम सपा की नहीं है। इस सीट ने अलग-अलग दौर में कई दलों को मौका दिया है। कांग्रेस का लंबा प्रभाव, जनसंघ और जनता पार्टी की जीत, भाजपा की शुरुआती सफलता, सपा का उभार और फिर 2017 से भाजपा की लगातार दो जीत—यह पूरा इतिहास बताता है कि इटावा का चुनावी समीकरण समय के साथ लगातार बदलता रहा है। अब 2027 में यह देखना दिलचस्प होगा कि मौजूदा राजनीतिक रुझान कायम रहता है या सीट एक बार फिर अपना सियासी रुख बदलती है।