किसी आपराधिक मामले में जब कोर्ट अंतिम बहस सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लेती है, तो आम तौर पर माना जाता है कि अब अगला कदम सिर्फ फैसला सुनाना है। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कुछ परिस्थितियों में ट्रायल कोर्ट इस चरण के बाद भी गवाह को बुला या दोबारा पूछताछ के लिए बुला सकती है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी सबूत की जरूरत मामले का सही और निष्पक्ष फैसला करने के लिए है, तो सिर्फ फैसला सुरक्षित रखे जाने की वजह से CrPC की धारा 311 के तहत अदालत की शक्ति खत्म नहीं हो जाती।
यह टिप्पणी जस्टिस मधु जैन ने 69 वर्षीय रमन सोनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। सोनी ने स्पेशल जज (PC Act) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें CBI की ओर से दाखिल धारा 311 की अर्जी को मंजूरी दी गई थी। मामला RAMAN SONI v. CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION से जुड़ा है।
2006 की जांच से शुरू हुआ मामला, 2008 में दाखिल हुई चार्जशीट
मामले की शुरुआत CBI की 2006 में दर्ज शुरुआती जांच से हुई थी। आरोप था कि MCD के अधिकारियों ने सार्वजनिक जमीन पर कथित कब्जे के खिलाफ जरूरी कार्रवाई नहीं की। इससे निजी बिल्डरों को आर्थिक फायदा पहुंचने का आरोप सामने आया। बाद में 2008 में दाखिल चार्जशीट में रमन सोनी को भी आरोपी बनाया गया।
मामले की सुनवाई आगे बढ़ी और ट्रायल कोर्ट ने अंतिम बहस के लिए 20 अप्रैल, 28 अप्रैल और 4 मई की तारीखें तय कीं। अंतिम बहस पूरी होने के बाद अदालत ने मामले को फैसला सुनाने के लिए सुरक्षित रख लिया।
यहीं से विवाद का अगला चरण शुरू हुआ। CBI ने CrPC की धारा 311 के तहत आवेदन देकर एक गवाह को दोबारा बुलाने की मांग की। एजेंसी का कहना था कि गवाह से कुछ ऐसे पहलुओं पर पूछताछ बाकी रह गई थी, जिन पर पहले पर्याप्त रूप से सवाल नहीं हुए थे।
फैसला सुरक्षित था, फिर भी CBI की अर्जी क्यों मंजूर हुई?
ट्रायल कोर्ट ने 8 जुलाई को CBI की अर्जी स्वीकार कर ली। अदालत ने माना कि CBI की तरफ से आवेदन करने और गवाह का बयान दर्ज कराने में देरी या लापरवाही रही थी। लेकिन केवल इस वजह से ऐसा सबूत सामने आने से नहीं रोका जा सकता, जो मामले के सही नतीजे के लिए जरूरी हो सकता है।
रमन सोनी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि फैसला सुरक्षित होने के साथ ट्रायल की प्रक्रिया समाप्त मानी जानी चाहिए। उनके मुताबिक इस चरण के बाद ट्रायल कोर्ट functus officio हो जाती है, यानी नए साक्ष्य दर्ज करने के लिए उसका अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा- सही फैसला जरूरी है तो धारा 311 की शक्ति इस्तेमाल हो सकती है
हाईकोर्ट ने कहा कि फैसला सुरक्षित किया जाना निश्चित रूप से ट्रायल की सामान्य प्रक्रिया पूरी होने का संकेत है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि CrPC द्वारा अदालत को दी गई स्पष्ट शक्ति पर रोक लग जाए।
कोर्ट के मुताबिक, धारा 311 अदालत को किसी गवाह को बुलाने या पहले से पेश गवाह को दोबारा बुलाने की व्यापक शक्ति देती है। इस शक्ति का इस्तेमाल कब किया गया, यह जरूर महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल अंतिम चरण होने के कारण अदालत अपने अधिकार का इस्तेमाल करने से वंचित नहीं हो जाती।
सबसे अहम कसौटी यह है कि क्या संबंधित गवाही या सबूत मामले के सही फैसले के लिए जरूरी है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस शक्ति का इस्तेमाल सिर्फ किसी पक्ष की अर्जी पर निर्भर नहीं है। अगर अदालत को खुद लगता है कि न्याय के लिए किसी गवाह की गवाही जरूरी है, तो वह suo motu यानी अपनी पहल पर भी गवाह को बुला सकती है।
‘कोर्ट मूक दर्शक नहीं रह सकती’, सच्चाई तक पहुंचना भी जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को सच्चाई सामने लाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। अदालत का काम केवल दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर निष्क्रिय रूप से फैसला सुनाना नहीं है। उसे निष्पक्ष और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करने के लिए कानून में मिली शक्तियों का इस्तेमाल भी करना चाहिए।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष की जरूरतों और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। यानी धारा 311 का इस्तेमाल किसी पक्ष को अनुचित फायदा देने के लिए नहीं, बल्कि न्याय के सही निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए होना चाहिए।
कोर्ट ने CBI के इस स्पष्टीकरण को भी अपर्याप्त नहीं माना कि गवाह से कुछ सवाल पूछना पहले अनजाने में छूट गया था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि धारा 311 का अधिकार मूल रूप से अदालत का है। किसी आवेदन में पक्षकार ने अपनी चूक को किस तरह समझाया है, केवल उसी आधार पर अदालत की शक्ति तय नहीं होगी।
अंततः हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही माना और रमन सोनी की याचिका खारिज कर दी। इस फैसले का सीधा संदेश यह है कि आपराधिक मुकदमे में प्रक्रिया महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी ऊपर न्यायपूर्ण और सही फैसला है। यदि रिकॉर्ड पर किसी जरूरी सबूत को लाना न्याय के लिए आवश्यक हो, तो फैसला सुरक्षित होने के बाद भी अदालत कानून के तहत उपलब्ध शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है।


