जिस दवा को मरीज बीमारी से राहत की उम्मीद में लेता है, उसमें अगर सक्रिय दवा की मात्रा ही दावे से काफी कम निकले तो सवाल सिर्फ एक कंपनी पर नहीं, पूरी दवा की गुणवत्ता व्यवस्था पर उठता है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की जुलाई की जांच में 199 दवा नमूने निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इनमें कुछ नमूनों में सक्रिय पदार्थ की मात्रा बहुत कम मिली, कुछ घुलने की जांच में फेल हुए और कुछ में पहचान या माइक्रोबियल गुणवत्ता से जुड़ी खामियां सामने आईं। एक नमूने को जांच में नकली भी घोषित किया गया।
सबसे गंभीर मामलों में दिल के मरीजों के लिए इस्तेमाल होने वाली क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन की संयुक्त दवा का नमूना सामने आया है। वहीं पेट की समस्या के लिए इस्तेमाल होने वाले एक कैप्सूल में जिन दो सक्रिय पदार्थों की मौजूदगी का दावा था, जांच में दोनों की मात्रा शून्य मिली। इससे यह सवाल भी उठता है कि बाजार में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता को लेकर निगरानी कितनी अहम है और मरीज को दवा खरीदते समय किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।
दिल की दवा में दावा और जांच के नतीजे में बड़ा अंतर
फार्मारूट्स हेल्थकेयर, हिमाचल प्रदेश की क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन वाली एक गोली के नमूने में क्लोपिडोग्रेल सिर्फ 38.20% और एस्पिरिन 21.8% पाया गया। यानी पैकेज पर बताई गई मात्रा और जांच में मिली मात्रा के बीच बड़ा अंतर था। नमूने में गोली के घुलने और फ्री सैलिसिलिक एसिड से संबंधित समस्या भी मिली।
जेएम लेबोरेटरीज की इसी तरह की दूसरी दवा भी गुणवत्ता जांच में असफल रही। इसमें एस्पिरिन 77.13% और फ्री सैलिसिलिक एसिड 12.01% पाया गया।
क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन ऐसी दवाएं हैं जिनका इस्तेमाल खून में थक्का बनने से रोकने के लिए किया जाता है। इसलिए इन दवाओं में गुणवत्ता से जुड़ी किसी भी गड़बड़ी को गंभीरता से देखना जरूरी हो जाता है।
पेट की दवा में दोनों सक्रिय पदार्थ 0.0 मिलीग्राम
जुलाई की सूची में सबसे चौंकाने वाले नमूनों में समय फार्मा इंडिया का R-Jara DSR कैप्सूल शामिल है। इसके पैक पर 20 मिलीग्राम रैबेप्राजोल और 30 मिलीग्राम डोमपेरीडोन होने का दावा था। लेकिन जांच में दोनों सक्रिय पदार्थों की मात्रा 0.0 मिलीग्राम मिली।
कुछ अन्य दवाओं में भी सक्रिय पदार्थ की मात्रा दावे से काफी कम पाई गई। डिवाइन मेडिकेयर की 300 मिलीग्राम प्रेगाबालिन कैप्सूल में 211.16 मिलीग्राम दवा मिली। एमके हेल्थकेयर की 100 मिलीग्राम इट्राकोनाजोल में मात्रा 63.54 मिलीग्राम पाई गई। वहीं रेल्टसेन हेल्थकेयर की 5 मिलीग्राम रामिप्रिल में सक्रिय पदार्थ केवल 64.20% मिला।
इस तरह के परिणाम यह दिखाते हैं कि दवा की गुणवत्ता केवल पैकेट पर लिखी मात्रा से तय नहीं होती। वास्तविक गुणवत्ता की पुष्टि प्रयोगशाला जांच से होती है।
ऑक्सीटोसिन से लेकर पैरासिटामोल तक कई दवाएं जांच में फेल
जैक्सन लेबोरेटरीज का ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन भी जांच में मानक पर खरा नहीं उतरा। इसमें ऑक्सीटोसिन की पहचान संबंधी जांच में नमूना विफल रहा। ऑक्सीटोसिन का इस्तेमाल प्रसव के दौरान गर्भाशय के संकुचन सहित कुछ चिकित्सकीय परिस्थितियों में किया जाता है।
पेट से जुड़ी दवाओं में इस्तेमाल होने वाले पैंटोप्राजोल और ओमेप्राजोल के भी कई नमूने घुलने की जांच में फेल हुए। कुछ अन्य दवाओं में सक्रिय पदार्थ की मात्रा, उसकी पहचान और हर टैबलेट में समान मात्रा होने से जुड़ी कमियां मिलीं।
एंटीबायोटिक दवाओं की जांच में भी कई नमूने असफल रहे। जेएमएच फार्मा की डिओमैक्स-एलबी में 250 मिलीग्राम वाली दवा के मुकाबले अमॉक्सिसिलिन सिर्फ 10.86 मिलीग्राम और क्लोक्सासिलिन 67.73 मिलीग्राम मिला। कुछ सेफिक्सिम और अमॉक्सिसिलिन-क्लैवुलैनिक एसिड वाली दवाओं में भी मात्रा, घुलने और पहचान से जुड़ी समस्याएं मिलीं।
बड़ी कंपनियों के उत्पाद भी सूची में, एक नमूना नकली
गुणवत्ता जांच में सिर्फ छोटी कंपनियों के उत्पाद शामिल नहीं हैं। लुपिन, सनोफी इंडिया, जायडस हेल्थकेयर, आईपीका लेबोरेटरीज, मैक्लियोड्स फार्मास्यूटिकल्स, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन फार्मास्यूटिकल्स और कैडिला फार्मास्यूटिकल्स के कुछ उत्पाद भी अलग-अलग जांच में निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरे।
एक नमूने को जांच में नकली भी घोषित किया गया। डायबिटिस-ऑल पाउडर में पियोग्लिटाजोन की मौजूदगी पाई गई, जबकि यह उत्पाद के घोषित दावे से मेल नहीं खाती थी।
पैरासिटामोल जैसी आम दवा भी इस सूची से बाहर नहीं रही। क्योरटेक फॉर्म्युलेशंस, जेनिथ ड्रग्स और अलवेंटा फार्मा के पैरासिटामोल उत्पादों में टैबलेट के घुलने से जुड़ी समस्या मिली। वहीं विवेक फार्माकेम के बच्चों के लिए बनाए गए पैरासिटामोल सिरप में सूक्ष्मजीव संबंधी जांच में खामी सामने आई।
इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि जांच में फेल हुआ हर नमूना बाजार में मौजूद हर दवा को खराब साबित करता है। लेकिन 199 नमूनों का गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरना दवाओं की नियमित और सख्त निगरानी की जरूरत जरूर दिखाता है। मरीज के लिए इसका महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि दवा की प्रभावशीलता काफी हद तक उसकी सही संरचना, निर्धारित मात्रा और गुणवत्ता पर निर्भर करती है। ऐसे में CDSCO जैसी नियामक जांच की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।


