संभल जामा मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा दावा: ‘धार्मिक स्वरूप बदलने की इजाजत नहीं’, सर्वे और पूजा के अधिकार पर क्या बोली कमेटी?

संभल जामा मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा दावा: ‘धार्मिक स्वरूप बदलने की इजाजत नहीं’, सर्वे और पूजा के अधिकार पर क्या बोली कमेटी?

संभल जामा मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मस्जिद कमेटी ने कानून की उन धाराओं पर जोर दिया है, जो किसी प्राचीन स्मारक के धार्मिक स्वरूप और उसकी पवित्रता को बनाए रखने से जुड़ी हैं। कमेटी की ओर से वरिष्ठ वकील हुज़ेफ़ा अहमदी ने कहा कि अगर किसी संरक्षित प्राचीन स्मारक का धार्मिक चरित्र पहले से मौजूद है, तो उसे बदलने या वहां नए धार्मिक दावे के आधार पर अनुष्ठान की अनुमति देने का सवाल सीधे कानूनी सुरक्षा से जुड़ जाता है।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने दलील देते हुए अहमदी ने कहा कि हिंदू पक्ष मुख्य रूप से प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (AMASR Act) की धारा 18 का हवाला दे रहा है। यह धारा संरक्षित स्मारक तक पहुंच के अधिकार से संबंधित है। लेकिन, उनके मुताबिक, इस मामले में धारा 16 की सुरक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण है।

धारा 16 का हवाला देकर मस्जिद कमेटी ने क्या कहा?

अहमदी ने अदालत में तर्क दिया कि धारा 16 पूजा स्थल को दुरुपयोग, प्रदूषण और अपवित्रता से बचाने का प्रावधान करती है। उनका कहना था कि जब कोई प्राचीन स्मारक धार्मिक स्वरूप वाला भी हो, तो उसके मौजूदा धार्मिक चरित्र को बनाए रखना कानून की बुनियादी भावना है।

कमेटी का कहना है कि वादियों की मांग केवल स्मारक तक पहुंचने तक सीमित नहीं है। उनका दावा धार्मिक अनुष्ठान और प्रार्थना करने के अधिकार से भी जुड़ा है। ऐसे में कमेटी के अनुसार, यह मांग उस कानूनी सुरक्षा से टकराती है, जिसके तहत स्मारक के मौजूदा धार्मिक स्वरूप को संरक्षित किया जाना चाहिए।

अहमदी ने धारा 16 की तुलना पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 3 से भी की। उन्होंने कहा कि दोनों प्रावधानों का मूल उद्देश्य पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप में बदलाव को रोकना है।

पूजा स्थल कानून पर भी सुप्रीम कोर्ट का ध्यान

सुनवाई के दौरान मस्जिद कमेटी ने Places of Worship Act, 1991 को लेकर भी अपनी दलील रखी। कमेटी ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष सही नहीं था कि इस कानून का संभल मामले पर असर नहीं पड़ता, क्योंकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण वाले स्मारकों को इससे छूट दी गई है।

अहमदी के मुताबिक, कानून की धारा 4(3) में दी गई छूट सिर्फ धारा 4 से संबंधित है। इसे पूरे कानून पर लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने जोर दिया कि धारा 3 पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र में बदलाव पर रोक लगाती है।

कमेटी ने यह भी कहा कि संभल मामले की सुनवाई उन याचिकाओं के साथ की जानी चाहिए, जिनमें पूजा स्थल कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है या उसे लागू कराने की मांग की गई है।

इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2024 के आदेश का भी हवाला दिया। तीन जजों की बेंच ने उस समय निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक देशभर में पूजा स्थलों से जुड़े नए मुकदमे दर्ज न किए जाएं। साथ ही, पहले से लंबित मामलों में प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश पारित करने पर भी रोक लगाई गई थी। इसमें सर्वे से जुड़े आदेश भी शामिल थे। कमेटी का तर्क है कि इस स्थिति में इलाहाबाद हाईकोर्ट को संभल मामले में आगे नहीं बढ़ना चाहिए था।

‘बिना नोटिस कमिश्नर नियुक्त करना जल्दबाजी थी’

मामले में एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति भी सुनवाई का अहम मुद्दा रही। मस्जिद कमेटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें स्थानीय जांच के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा गया था।

अहमदी ने कहा कि 19 नवंबर 2024 को ट्रायल कोर्ट ने कमेटी को नोटिस दिए बिना एकतरफा तरीके से कमिश्नर नियुक्त कर दिया। उनके मुताबिक, अदालत ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि कमिश्नर को किन खास बिंदुओं की जांच करनी है और किस तरह की रिपोर्ट देनी है।

उन्होंने CPC के Order XXVI Rule 9 का हवाला देते हुए कहा कि स्थानीय जांच के लिए कमिश्नर नियुक्त करते समय अदालत को यह तय करना जरूरी है कि जांच किन मुद्दों पर होगी। उनके अनुसार, ट्रायल कोर्ट ने इस जरूरत पर पर्याप्त संतुष्टि दर्ज नहीं की।

अहमदी ने नियुक्ति की टाइमिंग पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मामला करीब 70 साल पुराने दावे से जुड़ा था। ऐसे में बिना नोटिस दिए इतनी जल्दी कमिश्नर नियुक्त करने की जरूरत क्या थी, यह समझना मुश्किल है।

उनकी दलील के मुताबिक, कमिश्नर के दौरे के बाद संभल में हिंसा हुई, जिसमें छह लोगों की मौत हुई और प्रार्थना में भी बाधा पहुंची।

‘कमीशन सबूत जुटाने के लिए नहीं, कोर्ट की मदद के लिए है’

मस्जिद कमेटी ने हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण को भी चुनौती दी, जिसके तहत कमीशन का इस्तेमाल किसी पक्ष को ‘सबसे अच्छा सबूत’ हासिल करने में मदद देने के लिए किया जा सकता है।

अहमदी ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत स्थानीय कमिश्नर की भूमिका अदालत की सहायता करना है। इसका उद्देश्य किसी एक पक्ष को मुकदमे के लिए सबूत जुटाने में मदद करना नहीं है।

उन्होंने अदालत को समझाया कि स्थानीय स्थिति को समझने के लिए कमीशन जारी किया जा सकता है। इसी तरह, कुछ परिस्थितियों में ट्रायल के बाद अदालत किसी ऐसे मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए मौके का निरीक्षण भी कर सकती है, जिसे दूसरे तरीके से तय करना मुश्किल हो।

इसके बाद वकील निज़ाम पाशा ने अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि Places of Worship Act, 1991 और AMASR Act, 1958 को अलग-अलग नहीं, बल्कि साथ पढ़ा जाना चाहिए। उनका तर्क था कि पूजा स्थल कानून में मौजूद ‘नॉन-रेट्रोग्रेशन’ यानी पीछे की स्थिति में लौटने से रोकने का सिद्धांत AMASR कानून में भी मौजूद है।

मस्जिद कमेटी की ओर से याचिकाकर्ताओं की दलीलें अब पूरी हो चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट अगली सुनवाई में प्रतिवादियों का पक्ष सुनेगा। फिलहाल अदालत के सामने बड़ा कानूनी सवाल यही है कि संभल जामा मस्जिद जैसे धार्मिक स्वरूप वाले संरक्षित स्मारक पर अलग-अलग कानूनों की सुरक्षा को किस तरह पढ़ा जाए और स्थानीय सर्वे की कार्यवाही किस सीमा तक आगे बढ़ सकती है।