नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामले में पत्रकार सत्यम वर्मा की जमानत याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई टाल दी है। अदालत ने पहले खुली अदालत में संकेत दिया था कि वर्मा को इसी मामले में जमानत पा चुके सह-आरोपी के आधार पर समानता (Parity) के सिद्धांत पर राहत दी जा सकती है। लेकिन राज्य सरकार की ओर से इस आधार पर जमानत का विरोध करने के लिए समय मांगे जाने के बाद सुनवाई आगे बढ़ा दी गई।
अब इस मामले में राज्य की आपत्तियां सुनी जाएंगी और अगली सुनवाई के लिए 23 सितंबर की तारीख तय की गई है।
मामला गौतम बुद्ध नगर के थाना फेस-2 में दर्ज क्राइम नंबर 164/2026 से जुड़ा है। यह उन 11 आपराधिक मामलों में से एक है, जिनमें सत्यम वर्मा के खिलाफ कार्रवाई की गई है।
किस मामले में मांगी गई है जमानत?
वर्मा की जमानत याचिका पर जस्टिस कृष्ण पहल की बेंच सुनवाई कर रही है। FIR में भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की कई धाराओं के अलावा आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम की धारा 7 और Prevention of Damage to Public Property Act की धारा 3/4 लगाई गई हैं।
यह मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन से संबंधित है। वर्मा के खिलाफ इसी घटनाक्रम को लेकर कुल 11 आपराधिक मामले दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।
हालांकि, मौजूदा याचिका में जमानत मिलने का मतलब यह नहीं होगा कि वर्मा तुरंत जेल से बाहर आ जाएंगे। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, वह अन्य आपराधिक मामलों में भी हिरासत में हैं। इसके अलावा उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत भी अलग से हिरासत में रखा गया है।
इसलिए इस एक मामले में जमानत का आदेश उनकी तत्काल रिहाई के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
शिव कुमार को 23 जून को मिली थी जमानत, अब उसी आधार पर दलील
इस मामले में सत्यम वर्मा की जमानत याचिका का एक अहम आधार उनके सह-आरोपी शिव कुमार उर्फ शिवा को मिली राहत है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 23 जून को शिव कुमार को इसी मामले में जमानत दी थी।
उस समय कोर्ट ने अपने आदेश में खास तौर पर यह बात दर्ज की थी कि शिव कुमार का नाम FIR में नहीं था। FIR एक भीड़ के खिलाफ दर्ज की गई थी। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, शिव कुमार 14 अप्रैल 2026 से जेल में थे।
मामले के दस्तावेजों, FIR, दोनों पक्षों की दलीलों और अन्य संबंधित सामग्री पर विचार करने के बाद कोर्ट ने माना था कि आरोपी ने जमानत का मामला बनाया है। इसके बाद जमानत मंजूर कर दी गई थी।
हालांकि, अदालत ने साथ ही स्पष्ट किया था कि जमानत देते समय वह मामले के अंतिम गुण-दोष पर कोई राय नहीं दे रही है।
अब 23 सितंबर पर टिकी नजर, लेकिन जमानत के बाद भी रिहाई तय नहीं
सत्यम वर्मा की ओर से इसी समानता के आधार पर जमानत की मांग की गई। अदालत की शुरुआती टिप्पणी से लगा कि कोर्ट सह-आरोपी को मिली राहत को ध्यान में रख सकती है। लेकिन राज्य सरकार ने इस आधार पर जमानत का विरोध करने के लिए मौका मांगा।
इसके बाद अदालत ने सुनवाई स्थगित कर दी और 23 सितंबर को राज्य की आपत्तियों पर सुनवाई तय की।
यहां एक अहम कानूनी पहलू यह है कि समानता का आधार अपने आप में हर आरोपी की जमानत सुनिश्चित नहीं करता। अदालत संबंधित आरोपी की भूमिका, FIR में उसका उल्लेख, उपलब्ध साक्ष्य और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए फैसला करती है।
इस मामले में भी अगली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की आपत्तियां रिकॉर्ड पर आने के बाद अदालत आगे की स्थिति तय करेगी।
वहीं, वर्मा की संभावित जमानत का व्यावहारिक असर भी सीमित हो सकता है, क्योंकि उनके खिलाफ अन्य मामलों में हिरासत और NSA के तहत अलग कार्रवाई जारी होने की बात दी गई है। यानी मौजूदा मामले में राहत मिलने के बावजूद उनकी तत्काल रिहाई जरूरी नहीं है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने इस मामले पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। 23 सितंबर की सुनवाई में राज्य की दलीलों और जमानत के लिए समानता के आधार पर पेश किए गए तर्कों पर आगे विचार होगा।
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