शिवसेना के चुनाव चिह्न और पार्टी पर नियंत्रण से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अहम सुनवाई हुई। एकनाथ शिंदे गुट ने अदालत में कहा कि 2022 में शिवसेना के भीतर पैदा हुआ विवाद सिर्फ विधायकों के अलग होने तक सीमित नहीं था। उसके पीछे पार्टी के संगठन और कैडर के स्तर पर भी असंतोष था। इसी आधार पर शिंदे गुट ने इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर के पैराग्राफ 15 के तहत चुनाव आयोग यानी ECI की कार्रवाई को उचित ठहराया।
शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल दलील रख रहे थे। वह उद्धव ठाकरे गुट की उस आपत्ति का जवाब दे रहे थे, जिसमें कहा गया है कि केवल कुछ विधायकों के अलग हो जाने से चुनाव आयोग को यह तय करने का अधिकार नहीं मिल जाता कि असली राजनीतिक पार्टी कौन-सी है।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग ने 17 फरवरी 2023 को शिंदे गुट को शिवसेना के रूप में मान्यता दी थी और उसे ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया था। उद्धव ठाकरे गुट ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
कौल बोले—असंतोष एक दिन में पैदा नहीं हुआ, संगठन में भी दिख रही थी दरार
कौल ने अदालत में कहा कि चुनाव आयोग ने केवल विधायकों की संख्या देखकर अपना अधिकार क्षेत्र तय नहीं किया था। उनके मुताबिक, आयोग के सामने ऐसे तथ्य भी थे, जिनसे पार्टी के अंदर व्यापक असंतोष और दो अलग-अलग गुटों के उभरने की बात सामने आती थी।
शिंदे गुट का तर्क था कि राजनीतिक दल में फूट की शुरुआत लेजिस्लेटिव विंग यानी विधायकों के समूह से होकर बाद में पूरे राजनीतिक संगठन तक पहुंच सकती है। इसके लिए यह जरूरी नहीं कि संगठनात्मक स्तर पर विवाद पहले दिखाई दे।
कौल ने सुनवाई के दौरान पार्टी के भीतर हुई अलग-अलग बैठकों, कार्यकर्ताओं में असंतोष और नेतृत्व तथा चीफ व्हिप के पद को लेकर दोनों गुटों के दावों का उल्लेख किया।
उन्होंने यह भी कहा कि दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की जा रही थी। उनके अनुसार, चुनाव के बाद कांग्रेस और NCP के साथ गठबंधन तथा पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन नहीं बुलाए जाने जैसे मुद्दों ने भी मतभेद को बढ़ाया।
शिंदे गुट की दलील में यह भी कहा गया कि शिवसेना और BJP ने चुनाव साथ मिलकर लड़ा था और चुनाव के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। कौल के मुताबिक, इन्हीं घटनाक्रमों के बीच पार्टी के अंदर यह भावना बनी कि मौजूदा व्यवस्था में काम करना संभव नहीं है और इसी पृष्ठभूमि में ECI के सामने पैराग्राफ 15 के तहत दावा किया गया।
2018 के शिवसेना संविधान पर क्यों आया विवाद? ECI के अधिकार पर भी बहस
सुनवाई में शिवसेना के 2018 के पार्टी संविधान का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। ठाकरे गुट की ओर से यह तर्क दिया गया कि चुनाव आयोग ने पार्टी संविधान की वैधता और उसके लोकतांत्रिक स्वरूप की जांच करके अपने अधिकार क्षेत्र से आगे कदम बढ़ाया।
इसके जवाब में कौल ने कहा कि चुनाव आयोग लंबे समय से मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के संगठनात्मक ढांचे में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जोर देता रहा है। उनके अनुसार, जब आयोग को यह तय करना हो कि किसी राजनीतिक पार्टी में संगठनात्मक बहुमत किसके पास है, तो पार्टी का वैध और मान्य संविधान महत्वपूर्ण हो जाता है।
कौल ने 1999 के शिवसेना संविधान का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, उस समय ECI के निर्देशों के बाद पार्टी के संगठन में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को शामिल किया गया था। उन्होंने दावा किया कि बाद में 2018 में सामने आया संविधान उस पुराने ढांचे से काफी अलग था।
शिंदे गुट की ओर से यह भी कहा गया कि ECI के रिकॉर्ड में 2018 का संविधान मौजूद नहीं था। ठाकरे गुट द्वारा 27 जनवरी 2018 के अनिल देसाई के पत्र पर भरोसा किए जाने पर भी कौल ने सवाल उठाया। उनका कहना था कि उस पत्र में संगठनात्मक चुनावों का जिक्र है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि 2018 का संविधान भी उसी समय ECI के पास जमा किया गया था।
कौल ने यह तर्क भी खारिज किया कि शिंदे गुट अब 2018 के संविधान पर सवाल नहीं उठा सकता, क्योंकि एकनाथ शिंदे खुद उस व्यवस्था के तहत किसी पद पर रह चुके थे। उन्होंने कहा कि यहां मुद्दा किसी व्यक्तिगत पद या चुनाव को चुनौती देने का नहीं, बल्कि ECI के उस परीक्षण का है जिसके जरिए राजनीतिक पार्टी में बहुमत का प्रतिनिधित्व करने वाले गुट की पहचान की जाती है।
‘सुभाष देसाई’ फैसले की व्याख्या पर भी आमने-सामने दोनों पक्ष
सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की 2023 की संविधान पीठ के सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव मामले के फैसले की व्याख्या को लेकर भी बहस हुई।
कौल ने ठाकरे गुट की उस व्याख्या पर आपत्ति जताई जिसमें राजनीतिक पार्टी और उसकी लेजिस्लेटिव पार्टी के बीच अंतर को आधार बनाया गया था। उन्होंने कहा कि संविधान पीठ ने व्हिप और विधायी दल के नेता की नियुक्ति के संदर्भ में दोनों को अलग माना था। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि सिंबल्स ऑर्डर के पैराग्राफ 15 के तहत विधायी बहुमत को पूरी तरह अप्रासंगिक कर दिया गया है।
उन्होंने सादिक अली मामले का भी संदर्भ दिया और कहा कि चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद में सीटों और हासिल किए गए वोटों की संख्या महत्वपूर्ण पहलू हो सकते हैं। उनके मुताबिक, विधायी बहुमत को पैराग्राफ 15 के तहत पूरी तरह बाहर कर देना सही व्याख्या नहीं होगी।
ठाकरे गुट की ओर से जिस राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य फैसले का हवाला दिया गया, उस पर भी कौल ने अंतर बताया। उनका कहना था कि राणा मामला दसवीं अनुसूची के तहत विधायकों की अयोग्यता से जुड़ा था, जबकि मौजूदा विवाद चुनाव आयोग के सामने सिंबल्स ऑर्डर के पैराग्राफ 15 के तहत यह तय करने का है कि मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व कौन करता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट सुनील प्रभु की याचिकाओं पर भी सुनवाई कर रहा है। इनमें महाराष्ट्र विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर राहुल नार्वेकर के 10 जनवरी 2024 के फैसले को चुनौती दी गई है। नार्वेकर ने दसवीं अनुसूची के तहत दोनों में से किसी भी गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार किया था।
इस सुनवाई का सीधा असर पार्टी के चुनाव चिह्न या तत्काल राजनीतिक गतिविधियों से आगे भी जा सकता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को यह देखना है कि पैराग्राफ 15 के तहत ECI की भूमिका, राजनीतिक पार्टी और लेजिस्लेटिव पार्टी के बीच संबंध तथा संगठनात्मक बहुमत तय करने के लिए किन पहलुओं को ध्यान में रखा जा सकता है।
सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है और दिए गए विवरण के मुताबिक मामले में बहस अगले दिन भी जारी रहेगी। मामला Sunil Prabhu v. Eknath Shinde, SLP(C) Nos. 1644-1662/2024 और संबंधित मामलों से जुड़ा है।


