सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act के तहत दोषसिद्धि से जुड़े एक अहम मामले में साफ किया है कि कानून में आरोपी के खिलाफ बनाई गई दोषी होने की कानूनी धारणा अंतिम या अटल नहीं होती। अगर आरोपी मामले में मौजूद गंभीर विसंगतियों और सबूतों की कमी को सामने लाने में सफल रहता है, तो अभियोजन पक्ष को फिर भी अपने आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करना होगा। इसी आधार पर जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
यह मामला ढाई साल की बच्ची से कथित यौन अपराध से जुड़ा था। निचली अदालत ने आरोपी को POCSO Act की धारा 6 के तहत 10 साल की कठोर कैद और जुर्माने की सजा सुनाई थी। साथ ही IPC की धारा 363 के तहत एक साल की कठोर कैद भी दी गई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
बच्ची के गायब होने से शुरू हुआ मामला, पार्क में मिलने के बाद उठे गंभीर सवाल
अभियोजन के मुताबिक, शिकायतकर्ता की करीब ढाई साल की बच्ची झुग्गी के पास खेलते समय अचानक गायब हो गई थी। बाद में जानकारी मिली कि आरोपी उसे पास के एक पार्क में लेकर गया था। घर लौटने पर बच्ची के कपड़ों पर खून दिखाई देने की बात कही गई। आरोप यह भी था कि बच्ची ने आरोपी का नाम लिया था।
इस मामले में IPC की धारा 363, 376 और 506 तथा POCSO Act की धाराओं 4 और 5 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई। हालांकि ट्रायल के दौरान आरोपी पर IPC की धारा 363 और 506 तथा POCSO Act की धारा 4 के तहत आरोप तय हुए। बाद में उसे POCSO Act के तहत गंभीर अपराध में दोषी ठहराया गया, जबकि IPC की धारा 506 के आरोप से बरी कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने जब रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की बारीकी से जांच की तो अभियोजन के मामले में कई महत्वपूर्ण असंगतियां सामने आईं।
शिकायतकर्ता और डॉक्टर के बयान में बड़ा अंतर, कोर्ट ने इसे मामूली नहीं माना
बेंच ने शिकायतकर्ता और सबसे पहले बच्ची की जांच करने वाले निजी डॉक्टर के बयानों की तुलना की। कोर्ट को इस बात को लेकर स्पष्ट विरोधाभास मिला कि बच्ची को मेडिकल जांच के लिए कब लाया गया और उस समय उसके साथ कौन मौजूद था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के अंतर को मामूली या नजरअंदाज करने योग्य नहीं माना जा सकता। खास तौर पर तब, जब दूसरे सबूत भी अभियोजन की कहानी को मजबूत नहीं करते हों।
कोर्ट ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता के बयान में कही गई कुछ महत्वपूर्ण बातें FIR में दर्ज नहीं थीं। पुलिस को फोन पर सूचना देने का दावा भी किसी पुलिस गवाह की गवाही से पुष्ट नहीं हुआ। इसके अलावा कथित घटना के करीब दो दिन बाद FIR दर्ज होने की बात भी रिकॉर्ड में सामने आई।
इन सभी परिस्थितियों को अदालत ने मामले की समग्र विश्वसनीयता परखते समय महत्वपूर्ण माना।
मेडिकल और DNA रिपोर्ट ने अभियोजन की कहानी को नहीं दिया सहारा
सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे अहम पहलुओं में से एक मेडिकल और फोरेंसिक सबूत रहे। शुरुआती जांच में एक गवाह ने बच्ची के प्राइवेट पार्ट पर लालिमा देखने की बात कही थी। लेकिन AIIMS में बच्ची की जांच करने वाले डॉक्टर को वल्वा क्षेत्र में किसी तरह की चोट या खून के धब्बे नहीं मिले।
डॉक्टर ने यह भी दर्ज किया कि बच्ची का हाइमन सामान्य था और उसमें कोई असामान्यता नहीं थी।
फोरेंसिक जांच ने भी अभियोजन के दावे को अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। FSL विशेषज्ञ ने बताया कि जैविक और DNA जांच के लिए भेजे गए सात पैकेटों में वीर्य या पुरुष DNA नहीं मिला। बच्ची के कपड़ों पर भी खून पाए जाने की पुष्टि नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि यह नहीं कहा कि केवल चोट या वीर्य के नहीं मिलने से यौन हमले का आरोप अपने आप गलत साबित हो जाता है। बेंच ने स्पष्ट किया कि इस मामले की परिस्थितियां अलग थीं, क्योंकि यहां मेडिकल रिकॉर्ड और FSL रिपोर्ट को एक साथ देखने पर अभियोजन द्वारा बताई गई पेनेट्रेटिव यौन हरकत की संभावना को समर्थन नहीं मिला।
POCSO की धारा 29-30 पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act की धारा 29 और 30 के तहत लागू होने वाली कानूनी धारणा पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ दोषी होने की धारणा को पूर्ण और अटल नहीं माना जा सकता।
अगर आरोपी अभियोजन के सबूतों में गंभीर विरोधाभास, कमियां या आवश्यक corroboration की कमी दिखाने में सफल रहता है, तो यह कानूनी धारणा उसी तरह प्रभावी नहीं रहती। ऐसी स्थिति में अभियोजन को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अपना मामला साबित करना पड़ता है।
बेंच ने State of U.P. v. Babulal Nath मामले का भी संदर्भ दिया। हालांकि कोर्ट ने मौजूदा मामले को उससे अलग माना। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, यहां डॉक्टर की गवाही और FSL रिपोर्ट को साथ में देखने पर कथित पेनेट्रेटिव हरकत की संभावना के खिलाफ महत्वपूर्ण परिस्थितिजन्य सामग्री मौजूद थी।
इसलिए बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ मामला उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया गया और आरोपी को बरी कर दिया गया।
मामला: Deepak in JC v. State Govt. of NCT Delhi


