लखनऊ में फर्जी कॉल सेंटर का खुलासा, Telegram से भर्ती और 20 दिन की ट्रेनिंग; अमेरिकियों से 100 करोड़ की ठगी का आरोप

लखनऊ में फर्जी कॉल सेंटर का खुलासा, Telegram से भर्ती और 20 दिन की ट्रेनिंग; अमेरिकियों से 100 करोड़ की ठगी का आरोप

अमेरिकी नागरिकों से 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की कथित ठगी करने वाले गिरोह के बारे में पुलिस की जांच में कई अहम जानकारी सामने आई है। पुलिस के मुताबिक, गिरोह में जालसाजों की भर्ती Telegram के जरिए की जाती थी। इसके बाद ऑनलाइन इंटरव्यू लिया जाता और चयनित लोगों को लखनऊ बुलाकर करीब 15 से 20 दिन की ट्रेनिंग दी जाती थी।

पुलिस के अनुसार, ट्रेनिंग के दौरान कर्मचारियों को ठगी करने के लिए तैयार की गई स्क्रिप्ट याद कराई जाती थी। इसके बाद अमेरिकी नागरिकों को कॉल कर तय तरीके से बातचीत की जाती थी। मामले में गिरफ्तार किए गए 16 आरोपियों से पूछताछ के दौरान भर्ती और ट्रेनिंग से जुड़े इस कथित नेटवर्क की जानकारी सामने आई है।

Telegram पर होती थी भर्ती

जांच में सामने आया कि कॉल सेंटर का हेड प्रियांशु उर्फ शिवा Telegram के जरिए नए लोगों से संपर्क करता था। नौकरी के नाम पर प्रचार किया जाता और इच्छुक लोगों का ऑनलाइन इंटरव्यू लिया जाता था।

प्रारंभिक चयन के बाद उन्हें लखनऊ बुलाया जाता था। पुलिस के मुताबिक, अंतिम चयन की प्रक्रिया में अहमदाबाद में बैठा कथित मास्टरमाइंड भी शामिल था। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद वह वीडियो कॉल के जरिए कर्मचारियों का इंटरव्यू लेता था।

15-20 दिन में ठगी की स्क्रिप्ट तैयार

पूछताछ में गिरफ्तार आरोपियों ने पुलिस को बताया कि ट्रेनिंग के दौरान उन्हें ठगी की पूरी स्क्रिप्ट याद कराई जाती थी। कर्मचारियों को अमेरिकी नागरिकों से बातचीत करने का तरीका और तय स्क्रिप्ट के मुताबिक बात करने की ट्रेनिंग दी जाती थी।

पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपियों में BTech, MBA और ग्रेजुएट युवाओं के साथ 12वीं और 10वीं पास लोग भी शामिल हैं। उन्हें कथित तौर पर 25 से 30 हजार रुपये महीने वेतन दिया जाता था। सेंटर की ओर से रहने और खाने की व्यवस्था भी की जाती थी।

कॉल सेंटर में अमेरिकी समय के हिसाब से काम कराया जाता था। रात में कर्मचारियों के लिए ऑनलाइन डिलीवरी एजेंसियों के जरिए खाना मंगाया जाता था।

हवाला के जरिए आती थी रकम

इंस्पेक्टर अलीगंज ध्रुव कुमार के मुताबिक, गिरोह के लोग अमेरिका से रकम हवाला के जरिए मंगाते थे। पुलिस के अनुसार, रकम पहले अहमदाबाद पहुंचती थी और वहां से लखनऊ लाई जाती थी।

इसी रकम से कॉल सेंटर के कर्मचारियों की सैलरी, बिल्डिंग का किराया और दूसरे खर्च पूरे किए जाते थे। पुलिस की प्राथमिक जांच में अभी तक गिरोह का कोई बैंक खाता सामने नहीं आया है।

गिफ्ट कार्ड नहीं दे पाए तो जेवर लेते थे

जांच में ठगी का एक और तरीका भी सामने आया है। पुलिस के मुताबिक, अगर जाल में फंसा कोई अमेरिकी नागरिक गिफ्ट कार्ड या क्रिप्टोकरेंसी के जरिए रकम देने में असमर्थता जताता था, तो उससे जेवर लेने की कोशिश की जाती थी।

इसके लिए कथित हैंडलर पीड़ित के घर तक पहुंचते थे और उसे यह कहकर भरोसा दिलाते थे कि जेवर सरकारी खजाने में सुरक्षित रखे जाएंगे।

पुलिस का कहना है कि कॉल सेंटर से बरामद मोबाइल फोन और लैपटॉप में इस तरह की गतिविधियों से जुड़े साक्ष्य मिले हैं।

कम अंग्रेजी जानने वालों को भी दी जाती थी स्क्रिप्ट

सहायक पुलिस आयुक्त अलीगंज शशि प्रकाश मिश्र के मुताबिक, गिरोह में अलग-अलग शैक्षणिक योग्यता वाले लोगों को शामिल किया गया था। जिन कर्मचारियों की अंग्रेजी कमजोर थी, उन्हें हिंदी में अंग्रेजी के वाक्य लिखकर स्क्रिप्ट दी जाती थी, ताकि वे कॉल के दौरान उसी के आधार पर बातचीत कर सकें।

फिलहाल पुलिस गिरोह के कथित मास्टरमाइंड, हवाला नेटवर्क और ठगी से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की जांच कर रही है।