सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में पुरुषों का दबदबा! जस्टिस उज्जल भुइयां ने उठाए सवाल, महिला जज को शामिल करने का दिया सुझाव

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में पुरुषों का दबदबा! जस्टिस उज्जल भुइयां ने उठाए सवाल, महिला जज को शामिल करने का दिया सुझाव

देश की सबसे बड़ी अदालत में जजों की नियुक्ति करने वाली कॉलेजियम व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक बार फिर सवाल उठे हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा है कि मौजूदा कॉलेजियम में पुरुषों का वर्चस्व है और इसमें महिलाओं को भी उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि कॉलेजियम की कार्यवाही में किसी महिला जज को आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल किया जाए। इससे न्यायिक नियुक्तियों से जुड़े फैसलों में महिलाओं के अनुभव और उनके नजरिये को भी जगह मिल सकेगी। जस्टिस भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की कम संख्या पर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक, देश की न्यायिक व्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद शीर्ष पदों तक पहुंचने में उनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है।

जस्टिस भुइयां ने ये बातें मेघालय स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के 12वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहीं। उनका बयान ऐसे समय आया है, जब न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व और जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर चर्चा लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ तीन महिला जज, कॉलेजियम की व्यवस्था पर सवाल

जस्टिस उज्जल भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की संख्या का जिक्र करते हुए बताया कि अदालत में कुल 35 जजों की संख्या के मुकाबले केवल तीन महिला जज हैं। उन्होंने कहा कि यह आंकड़ा देश में महिला वकीलों और महिला जजों की वास्तविक भागीदारी को नहीं दर्शाता।

उनका मानना है कि न्यायपालिका के शीर्ष स्तर पर महिलाओं की कम मौजूदगी को सामान्य स्थिति मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

जस्टिस भुइयां ने पिछले साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट परिसर में महिला वकीलों की ओर से आयोजित एक सेमिनार का भी जिक्र किया। इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में महिलाओं को सीनियर एडवोकेट के रूप में नामित करने और जजों के पद पर नियुक्त करने में पर्याप्त अवसर देने पर चर्चा हुई थी।

इसी दौरान उन्होंने सुझाव दिया था कि पुरुषों के वर्चस्व वाले कॉलेजियम में किसी महिला जज को आमंत्रित सदस्य बनाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि इससे कानूनी पेशे में महिलाओं की वास्तविक स्थिति और उनके अनुभवों को नियुक्ति से जुड़े फैसलों में बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।

न्यायिक सेवाओं में महिलाएं आगे, लेकिन बड़े पदों पर पहुंचते ही घट जाती है संख्या

जस्टिस भुइयां ने न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण अंतर सामने रखा। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में महिलाएं न्यायिक सेवाओं में प्रवेश कर रही हैं और अपनी काबिलियत भी साबित कर रही हैं। इसके बावजूद सीनियर एडवोकेट के रूप में उनके नामांकन और उच्च न्यायिक पदों पर नियुक्ति के मामले में उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।

उन्होंने इसके पीछे चयन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले व्यक्तिपरक यानी सब्जेक्टिव मानदंडों को एक वजह बताया।

जस्टिस भुइयां के अनुसार, जहां नियुक्ति और चयन के लिए स्पष्ट तथा वस्तुनिष्ठ (Objective) मानदंड अपनाए जाते हैं, वहां महिलाओं की भागीदारी बेहतर नजर आती है। लेकिन जहां चयन प्रक्रिया व्यक्तिगत आकलन और सिफारिशों पर अधिक निर्भर होती है, वहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व प्रभावित होता दिखाई देता है।

यह अंतर न्यायिक व्यवस्था में अवसरों की समानता को लेकर भी सवाल खड़ा करता है। आखिर जब महिलाएं शुरुआती स्तर पर अपनी योग्यता साबित कर रही हैं, तो उच्च पदों तक पहुंचने के दौरान उनकी संख्या क्यों कम हो रही है?

असम में 65% महिलाएं, लेकिन Grade-I पदों पर भागीदारी 30% तक

जस्टिस भुइयां ने अपने शोध का हवाला देते हुए असम, मेघालय, राजस्थान, महाराष्ट्र और तेलंगाना की न्यायिक सेवाओं के आंकड़े भी सामने रखे।

उन्होंने बताया कि इन राज्यों में Grade III न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी 50 प्रतिशत से अधिक है। असम में यह आंकड़ा करीब 65 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। यानी शुरुआती स्तर पर न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की मौजूदगी काफी मजबूत है।

हालांकि, जैसे-जैसे पद और जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, महिलाओं की संख्या घटने लगती है।

उनके मुताबिक, Grade II यानी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट स्तर पर महिलाओं की भागीदारी करीब 45 प्रतिशत है। वहीं Grade I स्तर पर यह आंकड़ा घटकर लगभग 25 से 30 प्रतिशत रह जाता है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व और कम दिखाई देता है।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम आधारित नियुक्तियों में महिलाओं की संख्या में इस तरह की गिरावट पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की अपनी महिला सहकर्मी जस्टिस बीवी नागरत्ना का भी उल्लेख किया।

कॉलेजियम में महिला जज की मौजूदगी से बदल सकता है नजरिया

जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी ने न्यायिक नियुक्तियों में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक अहम बहस छेड़ दी है। उनका सुझाव है कि कॉलेजियम में महिला जज को आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल करने से नियुक्तियों से जुड़े फैसलों में महिलाओं के अनुभवों को भी महत्व मिल सकता है।

इसका असर सिर्फ अदालतों में महिला जजों की संख्या तक सीमित नहीं रहेगा। न्यायपालिका में महिलाओं को सीनियर एडवोकेट बनने और जिम्मेदार पदों तक पहुंचने के अवसरों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

फिलहाल जस्टिस भुइयां का यह सुझाव कॉलेजियम की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की मांग के तौर पर सामने आया है। हालांकि, इसे लागू करने को लेकर कोई निर्णय घोषित नहीं किया गया है। लेकिन उनकी टिप्पणी ने एक बुनियादी सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि जब न्यायिक सेवाओं के शुरुआती स्तर पर महिलाएं बड़ी संख्या में मौजूद हैं, तो देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व इतना सीमित क्यों है?