गोवा में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान नाम हटाए जाने का मामला अब बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। अदालत ने एक परिवार को बड़ी राहत देते हुए चुनाव आयोग (ECI) को उसके छह सदस्यों के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने सांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) को इसके लिए 10 दिन का समय दिया है। खास बात यह है कि परिवार ने केवल अपना पता बदलने के लिए फॉर्म-8 जमा किया था, लेकिन इसके बावजूद सभी छह सदस्यों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए और कहा कि किसी नागरिक को ऐसी घोषणा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उसकी वास्तविक स्थिति के खिलाफ हो।
SIR में कैसे कट गए एक ही परिवार के छह सदस्यों के नाम?
यह मामला गोवा के सांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र का है। यहां रहने वाले सालगांवकर परिवार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर बताया कि उन्होंने अपने निवास का पता बदलने के लिए चुनाव आयोग के पास फॉर्म-8 जमा किया था।
फॉर्म-8 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज जानकारी, खासकर निवास स्थान के पते में बदलाव कराने के लिए किया जाता है। परिवार का कहना था कि उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत पता बदलने का आवेदन दिया था, लेकिन इसके बावजूद SIR के दौरान जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची से परिवार के छह सदस्यों के नाम हटा दिए गए।
इससे परिवार के सामने अपने मतदान के अधिकार को लेकर परेशानी खड़ी हो गई। मामला अदालत पहुंचा तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से इस पूरी प्रक्रिया पर जवाब मांगा।
गुरुवार, 5 नवंबर को जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसंडेकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की और परिवार के पक्ष में महत्वपूर्ण आदेश जारी किया।
चुनाव आयोग की दलील पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने दलील दी कि SIR के नियमों के तहत फॉर्म-8 के साथ पहले से भरा हुआ एन्यूमरेशन फॉर्म (Enumeration Form) जमा करना भी जरूरी था।
आयोग के मुताबिक, सालगांवकर परिवार ने यह फॉर्म जमा करने से इनकार कर दिया था। इसी वजह से उन्हें मतदाता सूची में दोबारा नाम शामिल कराने के लिए फॉर्म-6 भरने की सलाह दी गई।
हालांकि, हाईकोर्ट इस दलील से सहमत नजर नहीं आया। अदालत ने सवाल उठाया कि जब कोई व्यक्ति पहले से मतदाता सूची में दर्ज है और केवल अपना पता बदलना चाहता है, तो उसे नए मतदाता की तरह फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है?
जस्टिस मेनेजेस ने एन्यूमरेशन फॉर्म से जुड़ी घोषणा पर भी सवाल उठाया। दरअसल, इस फॉर्म में मतदाता को यह बताना होता है कि वह मौजूदा मतदाता सूची में दर्ज पते पर ही रह रहा है।
अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने वास्तव में अपना निवास स्थान बदल लिया है, तो उससे यह घोषणा करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह अभी भी पुराने पते पर रह रहा है?
कोर्ट की टिप्पणी का साफ मतलब था कि किसी नागरिक को ऐसी जानकारी देने या घोषणा पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जो वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाती।
सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने की दलील भी नहीं आई काम
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने यह भी अनुरोध किया कि SIR से जुड़ा मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसलिए बॉम्बे हाईकोर्ट को फिलहाल इस याचिका पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए।
लेकिन खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा याचिका का मुद्दा अलग है। यह मामला SIR की पूरी प्रक्रिया को चुनौती देने के बजाय एक परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने से जुड़ा है।
अदालत ने कहा कि इस आधार पर याचिका की सुनवाई टालने की जरूरत नहीं है।
पीठ ने नियम-12 का भी उल्लेख किया और सवाल किया कि जब नियमों में आपत्तियां दर्ज कराने और दूसरी प्रक्रियाओं का प्रावधान मौजूद है, तो नागरिकों को सीधे फॉर्म-8 के जरिए पता बदलने की सुविधा क्यों नहीं दी जा सकती?
कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी नागरिक के लिए एन्यूमरेशन फॉर्म पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए, खासकर तब जब उसमें दी गई घोषणा उसकी मौजूदा स्थिति के विपरीत हो सकती है।
10 दिन में नाम जोड़ने का आदेश, ECI को नहीं मिली रोक
सभी दलीलें सुनने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने सालगांवकर परिवार की याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने गोवा के सांताक्रूज निर्वाचन क्षेत्र के BLO को निर्देश दिया कि वह आदेश की तारीख से 10 दिनों के भीतर परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची में दोबारा शामिल करे।
चुनाव आयोग की ओर से इस आदेश पर दो सप्ताह तक रोक लगाने की मांग भी की गई थी, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया।
इस फैसले का महत्व सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं है। वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होना मतदान के अधिकार का आधार है। ऐसे में पता बदलने या दस्तावेजी प्रक्रिया के दौरान किसी मतदाता का नाम हट जाना उसके लिए बड़ी परेशानी बन सकता है।
हालांकि, यह आदेश इस विशेष मामले में दिया गया है। इसे SIR की पूरी प्रक्रिया पर रोक के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट की टिप्पणी ने एक अहम सवाल जरूर खड़ा किया है कि मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया में नागरिकों के अधिकार और वास्तविक परिस्थितियों का ध्यान रखना कितना जरूरी है।

