सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान कथित पुलिस हिंसा की जांच को लेकर बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने जांच के लिए गठित हाई-पावर्ड इन्क्वायरी कमेटी (HPEC) को निर्देश दिया है कि वह पीड़ितों की ओर से याचिकाकर्ताओं द्वारा पहले से दाखिल किए गए वीडियो, याचिकाओं और हलफनामों की भी जांच करे। यानी अब जांच केवल उन शिकायतों तक सीमित नहीं रहेगी, जो सीधे कमेटी के पोर्टल पर दर्ज कराई गई हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट में पहले से मौजूद सामग्री को भी जांच का हिस्सा बनाया जाएगा। इस मामले में कोर्ट की चिंता इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि शिकायत दर्ज कराने के लिए पोर्टल और ईमेल की सुविधा शुरू होने के बावजूद अब तक बहुत कम लोग सामने आए हैं।
शिकायतों का इंतजार कर रही कमेटी, लेकिन सामने नहीं आ रहे पीड़ित
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के सामने बुधवार को HPEC की एक्शन टेकन रिपोर्ट पेश की गई। इस कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं।
सुनवाई के दौरान कमेटी की ओर से बताया गया कि पीड़ितों की शिकायतें दर्ज करने के लिए विशेष पोर्टल और ईमेल आईडी शुरू की गई थी। इसके अलावा शिकायतकर्ताओं को नोटिस भी भेजे गए। बावजूद इसके, शिकायतों की संख्या काफी कम रही।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बताया कि 29 अक्टूबर को कमेटी के कार्यालय में बैठक हुई थी। इस दौरान शिकायतकर्ताओं को बुलाया गया, लेकिन केवल एक व्यक्ति ही वहां पहुंचा और उसने अपना हलफनामा दाखिल किया। कुछ पुलिसकर्मी भी कमेटी के सामने पेश हुए थे।
इस पर अदालत ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों से अपील की कि वे कथित हिंसा से प्रभावित लोगों को शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित करें। कोर्ट का मानना है कि जांच को प्रभावी बनाने के लिए पीड़ितों की बात और उनके पास मौजूद सबूत सामने आना जरूरी है।
याचिकाकर्ताओं ने कहा- हमारे पास पहले से हैं पुलिस हिंसा के सबूत
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने अदालत को बताया कि शिकायत पोर्टल शुरू होने से पहले ही कमेटी को एक प्रतिवेदन सौंपा जा चुका था। पोर्टल शुरू होने के बाद तय प्रक्रिया के तहत एक और प्रतिवेदन दाखिल किया गया।
वहीं, सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायण ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट में पहले से दाखिल याचिकाओं और वीडियो क्लिप में कथित पुलिस हिंसा से जुड़े महत्वपूर्ण सबूत मौजूद हैं। ऐसे में हर पीड़ित को अलग-अलग कमेटी के सामने पेश होने के लिए कहने के बजाय, अदालत में उपलब्ध सामग्री भी जांच कमेटी तक पहुंचाई जानी चाहिए।
दूसरी ओर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि जनहित याचिका दाखिल करने वाले लोगों के पास जरूरी नहीं कि घटनाओं की व्यक्तिगत जानकारी हो।
वृंदा ग्रोवर ने यह भी आरोप लगाया कि कथित पुलिस हिंसा के मामले में अब तक एक भी FIR दर्ज नहीं की गई है। गोपाल शंकरनारायण ने कहा कि कमेटी का गठन होने के बावजूद कथित तौर पर जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी नहीं हुई है।
इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि जांच कमेटी का गठन पुलिस विभाग या उसके वरिष्ठ अधिकारियों को अपने स्तर पर कार्रवाई करने से नहीं रोकता। यानी कमेटी की जांच और पुलिस विभाग की कार्रवाई दोनों अलग-अलग स्तर पर आगे बढ़ सकती हैं।
गुमनाम शिकायत की सुविधा, प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के लिए अलग विकल्प
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए उन्हें सभी प्रासंगिक दस्तावेज और सबूत HPEC को सौंपने की अनुमति दे दी। इसमें सुप्रीम कोर्ट में पहले से दाखिल याचिकाएं, हलफनामे और वीडियो सामग्री भी शामिल हैं।
अदालत ने साफ किया कि पीड़ितों की ओर से याचिकाकर्ताओं द्वारा भेजी गई जानकारी और दस्तावेजों पर भी कमेटी विचार करेगी।
सुनवाई के दौरान यह जानकारी भी सामने आई कि HPEC के पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराने के लिए गुमनाम रहने का विकल्प उपलब्ध है। शिकायतकर्ता को अपना नाम, मोबाइल नंबर या दूसरी व्यक्तिगत जानकारी देना जरूरी नहीं है। पोर्टल पर प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के लिए अलग-अलग विकल्प बनाए गए हैं।
यह व्यवस्था उन लोगों के लिए अहम हो सकती है, जो किसी कारण से अपनी पहचान उजागर किए बिना जांच कमेटी तक अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं।
अब अनिश्चितकाल तक शिकायतों का इंतजार नहीं करेगी कमेटी
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कमेटी की ओर से पेश एमिकस क्यूरी और एडवोकेट मोनिका गुसाईं से कहा कि जांच कमेटी शिकायतों का अनिश्चितकाल तक इंतजार न करे। उसे अब तक मिली शिकायतों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तथ्य-जांच रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए।
सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने मांग की कि कमेटी की रिपोर्ट सभी पक्षकारों को उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे रिपोर्ट का अध्ययन कर सकें और अदालत के सामने अपना पक्ष रख सकें।
इसके अलावा वृंदा ग्रोवर ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने अब तक उस अधिकारी से जुड़ा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया है, जिसने प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन चलाने की अनुमति दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में मेघालय के पूर्व डीजीपी डॉ. एल.आर. बिश्नोई का कमेटी से इस्तीफा स्वीकार किए जाने की बात भी दर्ज की।
आम लोगों के लिहाज से इस सुनवाई का महत्व यह है कि कथित पुलिस हिंसा की जांच में अब पीड़ितों के व्यक्तिगत बयान के साथ-साथ पहले से उपलब्ध वीडियो और दस्तावेजों को भी महत्व मिलेगा। इससे जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ने और घटनाओं से जुड़े तथ्यों को सामने लाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, फिलहाल अदालत ने जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों पर कोई फैसला नहीं दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि कमेटी उपलब्ध सबूतों के आधार पर अपनी रिपोर्ट में क्या तथ्य सामने रखती है।

