दिल्ली शराब घोटाला केस में केजरीवाल-सिसोदिया को ‘क्लीनचिट’ मिलने से कैसे बदलेगा सियासी खेल?

दिल्ली शराब घोटाला केस में केजरीवाल-सिसोदिया को ‘क्लीनचिट’ मिलने से कैसे बदलेगा सियासी खेल?

दिल्ली की राजनीति में पिछले तीन साल से छाया रहा शराब नीति मामला अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। राउज एवेन्यू कोर्ट ने केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) को बड़ा झटका देते हुए आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि दोनों नेताओं के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं। फैसले के बाद अदालत परिसर का दृश्य भावनात्मक था। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया से गले मिले और उनकी आंखें भर आईं।

यह वही मामला है, जिसने 2022 से दिल्ली की सियासत को हिला कर रख दिया था। गिरफ्तारी, जेल, आरोप-प्रत्यारोप और सत्ता परिवर्तन—सब कुछ इस केस के इर्द-गिर्द घूमता रहा। अब सवाल यह है कि अदालत की यह राहत आने वाले चुनावी समीकरणों को किस तरह प्रभावित करेगी।

अदालत का फैसला

राउज एवेन्यू कोर्ट के जज जितेंद्र सिंह ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में असफल रहा। अदालत का यह रुख सीबीआई की जांच पर सवाल खड़े करता है।

फैसले के तुरंत बाद अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया मीडिया के सामने आए। केजरीवाल की आंखों में नमी थी। उन्होंने इसे सच की जीत बताया। यह मामला केवल कानूनी लड़ाई नहीं था। यह राजनीतिक अस्तित्व की परीक्षा भी थी।

2022 में जब यह कथित घोटाला सामने आया, तब आम आदमी पार्टी के कई बड़े नेता जेल गए। संजय सिंह सहित कई नाम चर्चा में रहे। बाद में दिल्ली की सत्ता भी हाथ से निकल गई। विपक्ष ने भ्रष्टाचार के आरोपों को बड़ा मुद्दा बनाया। अब अदालत की क्लीनचिट ने उस नैरेटिव को चुनौती दी है।

किन राज्यों में पड़ेगा असर?

2012 में बनी आम आदमी पार्टी ने दिल्ली से शुरुआत की थी। आज उसका प्रभाव दिल्ली, पंजाब, गुजरात, गोवा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर तक फैला है। पंजाब में पार्टी की सरकार है। दिल्ली में वह विपक्ष में है।

अगले दो वर्षों में पंजाब, गुजरात, गोवा और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में यह फैसला आम आदमी पार्टी के लिए राजनीतिक ऑक्सीजन साबित हो सकता है। पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा गया कि ये आंसू झूठी राजनीति पर भारी पड़ेंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में इस फैसले का सीधा असर दिख सकता है। वहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच सीधी टक्कर है। यदि केजरीवाल इस फैसले को नैतिक जीत के रूप में पेश करते हैं, तो वह अपने समर्थकों को फिर से संगठित कर सकते हैं।

गुजरात और गोवा में स्थिति अलग है। वहां सत्ता में भारतीय जनता पार्टी है, लेकिन कांग्रेस भी मजबूत उपस्थिति रखती है। ऐसे में आम आदमी पार्टी का उभार सीधे तौर पर कांग्रेस के वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है।

बीजेपी को नुकसान, या कांग्रेस को झटका?

यह बड़ा सवाल है। जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें आम आदमी पार्टी की सीधी टक्कर हर जगह बीजेपी से नहीं है। पंजाब और हिमाचल में मुकाबला कांग्रेस से है। गोवा और गुजरात में बीजेपी सत्ताधारी है, पर कांग्रेस मुख्य विपक्ष के रूप में मौजूद है।

गुजरात के आंकड़े इस समीकरण को समझने में मदद करते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के वोट प्रतिशत लगभग बराबर थे। 2022 में बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ा, कांग्रेस का घटा, और आम आदमी पार्टी को करीब 13 प्रतिशत वोट मिले। विश्लेषण से यह संकेत मिला कि कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगी। नतीजा यह रहा कि कांग्रेस की सीटें 77 से घटकर 27 रह गईं, जबकि बीजेपी 99 से बढ़कर 156 पर पहुंच गई।

ऐसे में अगर आम आदमी पार्टी फिर से मजबूती से मैदान में उतरती है, तो नुकसान किसे होगा—यह सवाल कांग्रेस के लिए अधिक गंभीर दिखता है।

सहानुभूति की राजनीति

पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े नेताओं की गिरफ्तारी हुई। पी चिदंबरम, कार्ति चिदंबरम, चंद्रबाबू नायडू, डीके शिवकुमार, हेमंत सोरेन जैसे नाम चर्चा में रहे। कुछ मामलों में जेल से बाहर आने के बाद नेताओं को राजनीतिक सहानुभूति का लाभ मिला।

दिल्ली में 2025 के विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जेल से बाहर आने के बावजूद चुनावी जीत हासिल नहीं कर सके। इसके विपरीत, झारखंड में हेमंत सोरेन ने वापसी की और सत्ता में लौटे। कर्नाटक में डीके शिवकुमार ने कांग्रेस को मजबूती दी। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू भी जेल से लौटने के बाद सत्ता में काबिज हुए।

इसी बीच कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच सांठगांठ का आरोप लगाया है। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह रजा बरार ने भी फैसले पर हैरानी जताई है। कांग्रेस नेतृत्व फिलहाल चुप है, लेकिन अंदरखाने चर्चा तेज है।

जनता क्या देख रही है?

एक आम मतदाता के लिए यह मामला केवल अदालत का फैसला नहीं है। यह भरोसे और पारदर्शिता से जुड़ा सवाल है। यदि अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी किया है, तो क्या राजनीतिक विमर्श भी बदलेगा? आम आदमी पार्टी इसे नैतिक जीत बताकर जनता के बीच जाएगी। विपक्ष इसे अलग नजर से देखेगा। चुनावी मंच पर यह मुद्दा फिर गूंजेगा। फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली शराब नीति मामला केवल एक कानूनी केस नहीं रहा। यह आने वाले चुनावों की दिशा तय करने वाला एक अहम अध्याय बन चुका है।