सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में पंजाब एंड सिंध बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक की बर्खास्तगी को बहाल कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि एक बैंक मैनेजर की तुलना गनमैन से करना “तर्क और समझ के खिलाफ” है। यह फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सुनाया।
हाईकोर्ट की राहत रद्द, फिर से बहाल हुई बर्खास्तगी
इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले आरोपी अधिकारी राज कुमार को राहत देते हुए बर्खास्तगी को “कंपल्सरी रिटायरमेंट” में बदल दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को गलत बताते हुए रद्द कर दिया और मूल सजा (dismissal) को बहाल कर दिया।
“ऊंचा पद, ज्यादा जवाबदेही”—कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
- वरिष्ठ पद पर बैठे अधिकारी से ज्यादा ईमानदारी और जिम्मेदारी की अपेक्षा होती है
- ऐसे अधिकारी सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि अपने अधीन काम करने वालों के लिए भी जवाबदेह होते हैं
कोर्ट ने जोर दिया कि सजा तय करते समय पद, जिम्मेदारी और भरोसे का स्तर अहम होता है, इसलिए सभी कर्मचारियों को एक जैसा मानना गलत है।
“समानता का सिद्धांत हर जगह लागू नहीं होता”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि “पैरिटी” यानी समानता का सिद्धांत हर मामले में लागू नहीं किया जा सकता। अगर दो लोगों के पद और जिम्मेदारियां अलग हैं, तो सजा भी अलग हो सकती है—और यह संविधान के खिलाफ नहीं है।
“प्रोपोर्शनैलिटी” का सिद्धांत समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में “Doctrine of Proportionality” को भी विस्तार से समझाया:
- सजा अपराध की गंभीरता के अनुसार होनी चाहिए
- अदालत तभी दखल दे सकती है, जब सजा बेहद असंगत या अन्यायपूर्ण लगे
- सिर्फ इसलिए हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता कि “कम सजा भी दी जा सकती थी”
मामला क्या था?
राज कुमार पर आरोप था कि उन्होंने:
- सहकर्मी और गनमैन के साथ मिलकर
- ग्राहकों के पैसे का गबन किया
- बैंक रिकॉर्ड में हेरफेर की
2014 में विभागीय जांच के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था। हालांकि अन्य आरोपियों को हल्की सजा दी गई थी—यही बात हाईकोर्ट के फैसले का आधार बनी थी।
कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
- बर्खास्तगी न तो अनुचित थी, न ही असंगत
- हाईकोर्ट ने गलत तरीके से हस्तक्षेप किया
अंत में कोर्ट ने सभी पक्षों को अपने-अपने खर्च खुद उठाने का निर्देश दिया।


