पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव सामने आया है। करीब 90.8 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 12% है। यह प्रक्रिया 155 दिनों तक चली और अब इसका अंतिम आंकड़ा सामने आया है। इसका सीधा असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है, क्योंकि जिन लोगों के नाम हटे हैं, वे अब मतदान नहीं कर पाएंगे।

दो चरणों में हुई कार्रवाई, दूसरे चरण पर ज्यादा विवाद
इस पूरी प्रक्रिया को दो हिस्सों में बांटा गया था।
- पहले चरण में करीब 63 लाख नाम हटाए गए, जिनमें मृत, अनुपस्थित या स्थान बदल चुके लोग शामिल थे।
- दूसरे चरण में 27 लाख नाम हटाए गए, जो ज्यादा विवादित रहा।
इस चरण में “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के आधार पर लोगों को बाहर किया गया। इसमें नाम की स्पेलिंग में फर्क, परिवार के सदस्यों की संख्या जैसी शर्तों को आधार बनाया गया। करीब 60 लाख लोगों की जांच के बाद 27 लाख को अंतिम रूप से अयोग्य घोषित किया गया।
किन जिलों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा
सबसे ज्यादा नाम हटाए जाने का असर कुछ खास जिलों में देखने को मिला:
- नॉर्थ 24 परगना: 12.6 लाख
- साउथ 24 परगना: 10.9 लाख
- मुर्शिदाबाद: 7.5 लाख
- मालदा और पूर्व बर्धमान भी प्रभावित
इनमें से कई जिले बांग्लादेश सीमा से सटे हैं और कुछ में मुस्लिम आबादी या मतुआ समुदाय की बड़ी संख्या है, जिससे इस मुद्दे का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।
कोलकाता में भी असर, लाखों वोटर कम
राजधानी Kolkata भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही।
- कोलकाता नॉर्थ में लगभग 4.5 लाख नाम हटे
- कोलकाता साउथ में करीब 2.5 लाख नाम हटे
पूरे महानगर में कुल मिलाकर करीब 7 लाख वोटर कम हो गए हैं, जो 2024 के मुकाबले बड़ा अंतर दिखाता है।
दो चरणों के चुनाव पर सीधा असर
पहले चरण की 152 विधानसभा सीटों की वोटर लिस्ट पहले ही फ्रीज हो चुकी है, जिसमें करीब 14.3 लाख वोटर हटाए गए।दूसरे चरण (29 अप्रैल) की 142 सीटों की लिस्ट 9 अप्रैल को फ्रीज होगी, जिसमें करीब 12.9 लाख नाम हटाए गए हैं। यह बदलाव चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद, लेकिन समय कम
इस मामले में Supreme Court of India ने हटाए गए वोटर्स को ट्रिब्यूनल में अपील करने की अनुमति दी है। हालांकि, ये ट्रिब्यूनल अभी तक शुरू नहीं हुए हैं, जिससे प्रभावित लोगों के पास समय बहुत कम बचा है। अदालत इस मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को करेगी, जिससे कुछ राहत मिलने की उम्मीद बनी हुई है।
आम मतदाता के लिए क्यों अहम है यह मुद्दा
यह मामला सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों का है। अगर लाखों लोग वोट नहीं डाल पाएंगे, तो इसका असर चुनावी नतीजों और प्रतिनिधित्व दोनों पर पड़ेगा। अब यह देखना अहम होगा कि कोर्ट और प्रशासन इस स्थिति को कैसे संभालते हैं।

