मालेगांव ब्लास्ट केस में बड़ा मोड़: बॉम्बे हाईकोर्ट ने आखिरी 4 आरोपियों को किया बरी, जांच एजेंसियों पर सख्त टिप्पणी

मालेगांव ब्लास्ट केस में बड़ा मोड़: बॉम्बे हाईकोर्ट ने आखिरी 4 आरोपियों को किया बरी, जांच एजेंसियों पर सख्त टिप्पणी

2006 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में एक अहम कानूनी मोड़ सामने आया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस केस में बचे आखिरी चार आरोपियों को बरी करते हुए न सिर्फ केस की दिशा बदल दी, बल्कि जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस फैसले के बाद अब इस मामले में कोई भी आरोपी ट्रायल का सामना नहीं कर रहा है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब यह मामला पहले ही कई सालों से अलग-अलग जांच और विवादों के कारण चर्चा में रहा है।

कोर्ट का साफ संदेश: जांच में भारी विरोधाभास

मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति श्याम सी. चांडक की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि एटीएस और एनआईए की जांच में गहरे विरोधाभास हैं। अदालत के मुताबिक, दोनों एजेंसियों की कहानी एक-दूसरे से मेल नहीं खाती।

कोर्ट ने विशेष एनआईए अदालत के उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें आरोपियों को आरोपमुक्त करने से इनकार किया गया था। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि निचली अदालत के फैसले में न्यायिक विवेक का पर्याप्त उपयोग नहीं दिखता।

किन आरोपियों को मिला राहत

जिन चार आरोपियों को बरी किया गया है, उनमें मनोहर नरवरिया, राजेंद्र चौधरी, धन सिंह और लोकेश शर्मा शामिल हैं। ये सभी 2019 से जमानत पर थे।

इससे पहले, 2016 में विशेष अदालत ने नौ मुस्लिम आरोपियों को भी आरोपमुक्त कर दिया था, जिन्हें शुरुआत में एटीएस ने गिरफ्तार किया था। अब इस फैसले के बाद केस में कोई भी आरोपी शेष नहीं रहा है।

सबूतों की कमी और गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि एनआईए ने 2011 में जांच अपने हाथ में लेने के बाद कोई नया ठोस सबूत पेश नहीं किया। एजेंसी का मामला मुख्य रूप से उन गवाहों और बयानों पर आधारित था, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया।

स्वामी असीमानंद के बयान का भी जिक्र हुआ, जिसे उन्होंने खुद बाद में बदल दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे गवाहों की गवाही भरोसेमंद नहीं मानी जा सकती।

कोर्ट ने यह भी पाया कि किसी भी गवाह ने इन आरोपियों की घटनास्थल पर मौजूदगी की पुष्टि नहीं की। ज्यादातर बयान ‘सुनी-सुनाई’ बातों पर आधारित थे।

दो जांच, दो कहानियां: कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

अदालत ने सबसे अहम सवाल यह उठाया कि एक ही घटना में दो अलग-अलग जांच एजेंसियां बिल्कुल अलग-अलग आरोपियों के खिलाफ कैसे सबूत पेश कर सकती हैं।

कोर्ट ने कहा कि एटीएस द्वारा जुटाए गए फॉरेंसिक सबूत और वॉयस सैंपल्स को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही, एनआईए की जांच इन तथ्यों से मेल नहीं खाती।

फैसले में यह भी कहा गया कि इस केस की जांच दो विपरीत दिशाओं में खड़ी है, जिसका कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकल रहा।

8 सितंबर 2006 को मालेगांव में हुए इस विस्फोट में 31 लोगों की जान गई थी। इतने वर्षों बाद आए इस फैसले ने न सिर्फ कानूनी प्रक्रिया, बल्कि जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता और समन्वय पर भी गंभीर बहस खड़ी कर दी है।