अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौता कराने की जिम्मेदारी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को दी थी। पाकिस्तान ने इस काम को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका, ईरान, चीन, सऊदी अरब, तुर्की और कतर के साथ कई दौर की बैठकें कीं। लेकिन अब असली तस्वीर सामने आ रही है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयान से लग रहा है कि पाकिस्तान केवल मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बजाय अपनी रणनीतिक पहल भी तेज कर रहा है।
यह घटनाक्रम मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था को बदलने वाला साबित हो सकता है। आम भारतीय पाठक के लिए यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक तनाव, तेल की कीमतों और क्षेत्रीय स्थिरता का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और विदेश नीति पर पड़ता है।
पाकिस्तान के रक्षा समझौते अंतिम चरण में
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बताया कि सऊदी अरब, कतर और तुर्की के साथ रक्षा संबंधी समझौते लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं। इन पर जल्द हस्ताक्षर हो सकते हैं। मध्य पूर्व के ज्यादातर देश अब तक अमेरिकी सुरक्षा छत्र पर निर्भर रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान की यह सक्रियता अमेरिका के लिए एक तरह का झटका मानी जा रही है।
पाकिस्तान इन बैठकों को ईरान-अमेरिका परमाणु समझौते से जोड़कर देख रहा है, जबकि असल में वह क्षेत्र में अपना अलग प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
तीन बड़े खुलासे जो अमेरिका के लिए परेशानी बन गए
पहला, सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, जंग के दौरान पाकिस्तान ने ईरान के विमानों को अपने बेस पर छिपाकर रखा था। सैटेलाइट इमेज से यह बात सामने आई। अमेरिका और इजराइल के हमलों से बचाने के लिए यह कदम उठाया गया था। ट्रंप के करीबी सांसद लिंडसे ग्राहम ने पाकिस्तान पर धोखा देने का आरोप लगाया, जिसे पाकिस्तान ने खारिज कर दिया है।
दूसरा, कतर, तुर्की और सऊदी अरब के साथ हाल में हुई बैठकों में ‘इस्लामिक नाटो’ के गठन पर चर्चा हुई है। यह प्रस्ताव अब फाइनल स्टेज में पहुंच गया है।
तीसरा, कुछ समय पहले पाकिस्तान और ईरान के बीच ग्वादर पोर्ट को लेकर समझौता हुआ। इसके तहत ईरान अपने सामान को ग्वादर के रास्ते भेज या बेच सकता है। यह अमेरिका की उस घोषणा के विपरीत है, जिसमें उसने होर्मुज के बाहर ईरानी जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही थी।
इस्लामिक नाटो की जरूरत और पाकिस्तान की रणनीति
कतर के पूर्व प्रधानमंत्री हमद बिन थानी का कहना है कि इजराइल मध्य पूर्व के ढांचे को बदलना चाहता है। इससे बचने के लिए गल्फ या इस्लामिक नाटो की जरूरत महसूस की जा रही है।
2025 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक समझौता किया था, जिसमें सऊदी को पाकिस्तान से परमाणु सुरक्षा की गारंटी मिली। पाकिस्तान अब इस सुरक्षा गारंटी को मध्य पूर्व में और बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। बदले में उसे इन देशों से आर्थिक मदद मिलने की उम्मीद है।
पाकिस्तान पर फिलहाल 10 बिलियन डॉलर से ज्यादा का कर्ज है। ऐसे में रक्षा और परमाणु सहयोग के जरिए आर्थिक राहत हासिल करना उसकी रणनीति का अहम हिस्सा नजर आता है।
भविष्य की दिशा
ईरान-अमेरिका परमाणु समझौते की मध्यस्थता पाकिस्तान के हाथ में होने के बावजूद, पाकिस्तान क्षेत्र में अपना स्वतंत्र प्रभाव विस्तार कर रहा है। इस्लामिक नाटो का गठन, ग्वादर समझौता और रक्षा सौदे दिखाते हैं कि खेल सिर्फ मध्यस्थता का नहीं, बल्कि रणनीतिक positioning का भी है।
अभी देखना यह होगा कि अमेरिका इस नई स्थिति पर कैसी प्रतिक्रिया देता है और ईरान के साथ अंतिम समझौता कब और किस रूप में होता है। वैश्विक स्तर पर यह बदलाव न केवल मध्य पूर्व, बल्कि पूरे एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित करेगा।


