महाराष्ट्र की राजनीति में जारी उठापटक के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। कोल्हापुर में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अमित शाह ने साफ शब्दों में कहा कि अब महाराष्ट्र में किसी ‘शिंदे गुट’ की बात नहीं होती, क्योंकि अब केवल एक ही शिवसेना है। शाह का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (UBT) अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकटों में से एक का सामना करती नजर आ रही है।
शाह की टिप्पणी को केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की बदलती सियासी तस्वीर का संकेत माना जा रहा है। खासकर तब, जब उद्धव गुट के कई सांसदों के बगावती रुख की चर्चा लगातार तेज हो रही है।
‘अब गुट नहीं, सिर्फ शिवसेना है’ — अमित शाह का संदेश
कोल्हापुर में आयोजित धन्यवाद रैली को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि एक समय ऐसा था जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी को अलग पहचान देने के लिए ‘शिवसेना शिंदे गुट’ कहना पड़ता था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि अब कोई गुट नहीं बचा है और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी ही शिवसेना के रूप में स्थापित हो चुकी है। शाह का यह बयान सीधे तौर पर उस राजनीतिक संघर्ष की ओर इशारा करता है, जो 2022 में शिवसेना के विभाजन के बाद शुरू हुआ था।
कार्यक्रम के दौरान अमित शाह ने कोल्हापुर स्थित प्रसिद्ध अंबाबाई मंदिर में पूजा-अर्चना भी की और मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण से जुड़े कार्यों की आधारशिला रखी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकास भी, विरासत भी’ विजन का उल्लेख करते हुए महाराष्ट्र में धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के विकास की बात कही।
उद्धव ठाकरे की पार्टी पर क्यों बढ़ा दबाव?
अमित शाह का बयान ऐसे समय आया है जब शिवसेना (UBT) के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के कुछ सांसद नेतृत्व से नाराज हैं और खुलकर विरोध के संकेत दे रहे हैं।
हाल के दिनों में पार्टी के भीतर चल रही हलचल ने उद्धव ठाकरे खेमे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पार्टी नेतृत्व लगातार एकजुटता का दावा कर रहा है, लेकिन घटनाक्रम कुछ और संकेत दे रहे हैं।
संसदीय दल की बैठक से गायब रहे 6 सांसद
दिल्ली में आयोजित शिवसेना (UBT) की संसदीय दल की बैठक ने इस संकट को और उजागर कर दिया। लोकसभा में पार्टी के कुल 9 सांसद हैं, लेकिन बैठक में केवल 3 सांसद ही पहुंचे।
बैठक से अनुपस्थित रहने वाले सांसदों में नागेश आष्टीकर, संजय देशमुख, संजय जाधव, संजय दीना पाटिल, ओमराजे निंबालकर और भाऊसाहेब वाकचौरे के नाम शामिल बताए जा रहे हैं। इन नेताओं की गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर संभावित बगावत की अटकलों को और बल दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इतने बड़े स्तर पर सांसद नेतृत्व से दूरी बनाते हैं, तो इसका असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की चेतावनी
बैठक से गैरहाजिर रहने वाले सांसदों के खिलाफ पार्टी ने सख्त रुख अपनाया है। लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक (Chief Whip) अनिल देसाई ने सभी अनुपस्थित सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
नोटिस में सांसदों से 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया है। पार्टी ने स्पष्ट किया है कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो इसे स्वेच्छा से पार्टी छोड़ने की कार्रवाई माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत कदम उठाए जा सकते हैं।
फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में नजरें उद्धव ठाकरे के अगले कदम और बागी सांसदों की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। वहीं अमित शाह का बयान इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक राजनीतिक महत्व देता दिखाई दे रहा है।



