बुराड़ी की टूटी सड़कों पर NGT सख्त, दिल्ली सरकार से मांगा जवाब, धूल, गड्ढों और जलभराव को लेकर उठे गंभीर सवाल

बुराड़ी की टूटी सड़कों पर NGT सख्त, दिल्ली सरकार से मांगा जवाब, धूल, गड्ढों और जलभराव को लेकर उठे गंभीर सवाल

दिल्ली के बुराड़ी इलाके में खराब सड़कें अब सिर्फ आवाजाही की परेशानी नहीं, बल्कि पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा बन गई हैं। सड़क पर जगह-जगह गड्ढे, खुली मिट्टी, अधूरी खुदाई और निर्माण मलबे की शिकायत को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने दिल्ली सरकार समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। मामला करीब दो लाख की आबादी से जुड़ा बताया गया है। NGT ने मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को तय की है।

यह याचिका बुराड़ी में रहने वाले वकील नंदना हरिकृष्णन की ओर से दाखिल की गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि इलाके का सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर लंबे समय से बेहद खराब स्थिति में है और इसका सीधा असर लोगों की आवाजाही के साथ-साथ हवा की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है।

2022 से खुदाई, लेकिन सड़क की हालत नहीं सुधरी

याचिका में बुराड़ी की कई सड़कों की स्थिति पर सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि कुछ सड़कें सिर्फ ढीली बजरी और खुली लाल मिट्टी से ढकी हैं। दूसरी जगहों पर गड्ढे हैं और कई हिस्सों में खुदाई के बाद सड़क को ठीक से बहाल नहीं किया गया।

याचिका में नथुपुरा को आउटर रिंग रोड से जोड़ने वाली प्रमुख सड़क का भी जिक्र है। इसमें नालंदा स्कूल और बुराड़ी सरकारी अस्पताल के आसपास का हिस्सा शामिल है। आरोप है कि सीवर और पाइपलाइन के काम के लिए इस रास्ते को बार-बार खोदा गया।

याचिका के मुताबिक, खुदाई का सिलसिला 2022 में शुरू हुआ था। लेकिन काम पूरा होने के बाद भी सड़क के बड़े हिस्से को सही तरीके से बहाल नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने इन हिस्सों को टूटे हुए, असुरक्षित और नियमित इस्तेमाल के लिए अनुपयुक्त बताया है।

दिल्ली जल बोर्ड की सिफारिश के बाद दोबारा खुदाई किए जाने का भी दावा किया गया है। लेकिन याचिका में आरोप है कि यह काम धीमी गति से और अलग-अलग हिस्सों में बिना पर्याप्त तालमेल के चल रहा है।

सड़क की धूल से हवा भी हो रही खराब?

याचिका में सड़क की खराब हालत को वायु प्रदूषण से भी जोड़ा गया है। दावा है कि जब गाड़ियां इन कच्चे और टूटे हिस्सों से गुजरती हैं तो सड़क की मिट्टी, गाद और निर्माण सामग्री हवा में उड़ती है। इससे आसपास धूल के गुबार बनते हैं और स्थानीय स्तर पर PM10 और PM2.5 जैसे पार्टिकुलेट मैटर का स्तर बढ़ सकता है।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि नगर निगम की ओर से धूल कम करने के लिए पानी का छिड़काव किया जाता है, लेकिन यह नियमित या प्रभावी नहीं है। खासकर गर्मियों में पानी जल्दी सूख जाने के कारण इसका असर ज्यादा देर नहीं रहता।

याचिका में सड़क की सफाई के तरीकों पर भी सवाल उठाया गया है। दावा है कि कुछ परिस्थितियों में सफाई के दौरान धूल खत्म होने के बजाय सड़क के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में फैल जाती है।

याचिका में ICMR की रिपोर्ट और 2019 में नेशनल एटमॉस्फेरिक रिसर्च लेबोरेटरी की सड़क से होने वाले PM10 उत्सर्जन पर की गई स्टडी का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि सड़क की धूल दोबारा हवा में उड़ना नॉन-एग्जॉस्ट प्रदूषण का बड़ा स्रोत है।

NGT से लेकर ड्रेनेज और सड़क मरम्मत तक कई मांगें

मामला सिर्फ धूल तक सीमित नहीं है। याचिका में खराब जल निकासी और सीवेज ओवरफ्लो को लेकर भी चिंता जताई गई है। खासकर मानसून के दौरान सड़कों और रिहायशी गलियों में गंदा पानी जमा होने से स्थानीय लोगों के लिए अतिरिक्त स्वास्थ्य जोखिम पैदा होने की बात कही गई है।

याचिकाकर्ता ने सड़क किनारे की ड्रेनेज व्यवस्था को ठीक करने और सीवेज को सड़कों पर बहने से रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की है।

इसके अलावा प्रभावित इलाकों में सप्लाई होने वाले पीने के पानी की जांच कराने और जरूरत पड़ने पर सुधारात्मक कार्रवाई करने की मांग भी की गई है।

सड़क की मरम्मत के लिए PWD और MCD को एक व्यापक और समय-सीमा वाली योजना तैयार करने का निर्देश देने की मांग की गई है। इसमें रोड रिपेयर के साथ खुदाई के बाद सड़क की दोबारा बहाली यानी Road Reinstatement को भी शामिल किया गया है।

25 नवंबर को होगी अगली सुनवाई

मामले की सुनवाई NGT की प्रिंसिपल बेंच ने की। चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और एक्सपर्ट मेंबर डॉ. अफरोज अहमद की बेंच ने संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया।

अदालत ने याचिकाकर्ता को नोटिस की तामील कराने और अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले इसका हलफनामा दाखिल करने को कहा है। अब इस मामले को 25 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।

फिलहाल NGT ने याचिका में लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। संबंधित सरकारी विभागों का जवाब सामने आने के बाद तस्वीर ज्यादा साफ होगी। लेकिन बुराड़ी का मामला यह जरूर दिखाता है कि सड़क की खराब हालत का असर केवल ट्रैफिक या आने-जाने की सुविधा तक सीमित नहीं रहता। जब टूटी सड़कें, उड़ती धूल, खराब ड्रेनेज और सीवेज की समस्या एक साथ मौजूद हों, तो इसका असर सीधे लोगों के रोजमर्रा के जीवन और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ सकता है।