सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने छात्रों के सवाल पूछने और असहमति जताने के अधिकार को लेकर अहम टिप्पणी की है। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के LLM दीक्षांत समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ इसलिए छात्रों को धमकाया या दंडित नहीं किया जा सकता क्योंकि उनकी राय किसी अधिकारी या संस्था की राय से अलग है। उन्होंने साफ कहा कि लोकतंत्र में सवाल करना बगावत नहीं, बल्कि संवैधानिक नागरिकता का हिस्सा है।
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश की दो प्रमुख लॉ यूनिवर्सिटीज में छात्रों के विरोध और दीक्षांत समारोह से जुड़े विवाद चर्चा में हैं। उन्होंने अपने संबोधन में असहमति, अभिव्यक्ति की आजादी और विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र सोच के महत्व पर विस्तार से बात की।
‘सवाल पूछना बगावत नहीं’, छात्रों को धमकाने पर क्या बोले जस्टिस भुइयां?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल पूछने का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है। अगर किसी छात्र की राय किसी अधिकारी से अलग है या वह किसी फैसले पर सवाल उठाता है, तो केवल इसी आधार पर उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा कि छात्रों को धमकाना या उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी देना असंवैधानिक है। उनके मुताबिक, ऐसा करना सत्ता और पद के दुरुपयोग की श्रेणी में आ सकता है।
उनका जोर इस बात पर था कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री हासिल करने की जगह नहीं हैं। ये वे संस्थान हैं जहां युवा सार्वजनिक मुद्दों पर सोचते हैं, सवाल करते हैं और अलग-अलग विचारों को समझना सीखते हैं।
NALSAR से NLSIU तक पहुंचा विवाद, दीक्षांत समारोह पर भी उठे सवाल
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी की पृष्ठभूमि में हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ का विवाद भी अहम है। यहां छात्रों के एक वर्ग ने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में तत्कालीन प्रस्तावित मुख्य अतिथि के रूप में CJI सूर्यकांत की भागीदारी को लेकर आपत्ति जताई थी। छात्रों की आपत्ति उनकी छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा को लेकर की गई टिप्पणियों से जुड़ी थी।
मामला उस समय और गंभीर हो गया जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने शुरुआत में राज्य बार काउंसिल को निर्देश दिया था कि अभियान की जांच पूरी होने तक NALSAR के 2026 बैच के छात्रों का एनरोलमेंट न किया जाए। विरोध के बाद BCI ने अपना पत्र वापस ले लिया।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी BCI के कदम पर सवाल उठाए और छात्रों तथा फैकल्टी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया।
विवाद यहीं नहीं रुका। बेंगलुरु की National Law School of India University (NLSIU) में भी छात्रों ने 2026 के दीक्षांत समारोह में CJI और BCI चेयरमैन की प्रस्तावित भागीदारी को लेकर आपत्ति जताई। इसके बाद NLSIU ने ‘अनिवार्य परिस्थितियों’ का हवाला देते हुए समारोह रद्द कर दिया और छात्रों को डिग्री ‘इन एब्सेंटिया’ यानी उनकी अनुपस्थिति में देने की बात कही।
संविधान एक जैसी सोच नहीं, अलग राय की जगह देता है
जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान का उद्देश्य लोगों को एक जैसा सोचने के लिए मजबूर करना नहीं है। संवैधानिक लोकतंत्र की ताकत इसी में है कि अलग-अलग विचार और विश्वास रखने वाले लोग समान सम्मान के साथ साथ रह सकें।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक समाज इस आधार पर नहीं चल सकता कि सभी नागरिकों की सोच एक जैसी हो। मतभेद होना स्वाभाविक है। जरूरत इस बात की है कि इन मतभेदों को संवैधानिक दायरे में जगह दी जाए।
जस्टिस भुइयां ने असहिष्णुता को संविधान की भावना के विपरीत बताया। उनके मुताबिक जब किसी असहमति को वैध विचारों के अंतर के बजाय दबाने या सजा देने योग्य चीज मान लिया जाता है, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है।
उन्होंने भारत की परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि देश बुद्ध और गांधी की भूमि है और समाज में हिंसा के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। संविधान लोगों को बोलने, सोचने और अलग नजरिया रखने की आजादी देता है।
यूनिवर्सिटी में मुश्किल सवालों की जगह होनी चाहिए
जस्टिस भुइयां ने कहा कि अगर देश में स्वतंत्र सोच और अलग-अलग विचारों का सम्मान करने वाला लोकतांत्रिक माहौल बनाना है तो इसकी शुरुआत विश्वविद्यालयों से होनी चाहिए।
उनके मुताबिक उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों को स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाने और मुश्किल विषयों पर खुलकर चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। किसी विचार को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह पहले से प्रचलित है।
उन्होंने कानून की पढ़ाई और कानूनी पेशे की भूमिका को भी इससे जोड़ा। उनके अनुसार कानून जानना ही पर्याप्त नहीं है। कानूनी पेशेवरों और शिक्षाविदों को उन संवैधानिक मूल्यों को भी समझना होगा जो कानून को वैधता देते हैं।
स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और न्याय केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं हैं। इन मूल्यों की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब समाज में असहमति या टकराव की स्थिति पैदा होती है।
जस्टिस भुइयां का संदेश यही रहा कि किसी छात्र का सवाल असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन केवल असहमति के कारण उसे दबाना लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए सही रास्ता नहीं है। विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसी जगह बने रहें जहां सवाल पूछना, तर्क करना और अलग सोच रखना शिक्षा का स्वाभाविक हिस्सा हो।



