मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर नगर निगम के एक अधिकारी की लापरवाही पर सख्त रुख अपनाते हुए उस पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। अधिकारी ने ऐसे कानूनी प्रावधानों के आधार पर आदेश जारी कर दिया था, जिन्हें साल 2020 में ही निरस्त किया जा चुका था। हाईकोर्ट ने इस गलती को कानून के प्रति गंभीर लापरवाही बताते हुए कहा कि सरकारी अधिकारियों को आदेश पारित करने से पहले संबंधित कानून और उसके मौजूदा प्रावधानों की सही जानकारी होनी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश वापस लेने की सहमति देने भर से अधिकारी की गलती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह मामला इंदौर नगर निगम की ओर से एक अस्पताल के खिलाफ जारी किए गए आदेश से जुड़ा है। अस्पताल ने नगर निगम की कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। सुनवाई के दौरान निगम ने विवादित आदेश वापस लेने पर सहमति जताई, लेकिन अदालत ने इसे केवल एक सामान्य गलती मानकर छोड़ने से इनकार कर दिया।
खत्म हो चुकी धाराओं के आधार पर कैसे जारी हुआ आदेश?
मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप एन. भट्ट की पीठ ने की। अस्पताल की ओर से दायर याचिका में इंदौर नगर निगम के 30 सितंबर 2026 को जारी आदेश और इसके बाद 7 अक्टूबर 2026 को जारी लेजर रिपोर्ट को चुनौती दी गई थी।
सुनवाई के दौरान सामने आया कि नगर निगम के संबंधित अधिकारी ने मध्य प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1956 की धारा 143, 146 और 153 का सहारा लेकर आदेश पारित किया था। परेशानी यह थी कि इन धाराओं को साल 2020 में ही हटा दिया गया था।
यानी जिस कानूनी आधार पर कार्रवाई की गई, वह उस समय प्रभावी नहीं था। हाईकोर्ट ने इसी बात को गंभीरता से लिया। अदालत के मुताबिक, किसी वैधानिक प्राधिकरण के अधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने फैसले में लागू कानून और वैध प्रावधानों का ही इस्तेमाल करे।
आम लोगों के लिए इस मामले का महत्व इसलिए है, क्योंकि नगर निगम जैसे सरकारी निकायों के फैसलों का सीधा असर अस्पतालों, कारोबारियों, संपत्ति मालिकों और आम नागरिकों पर पड़ सकता है। ऐसे में आदेश जारी करने की प्रक्रिया में कानूनी शुद्धता जरूरी है।
नगर निगम ने गलती मानी, लेकिन कोर्ट ने क्यों नहीं दी राहत?
सुनवाई के दौरान नगर निगम के वरिष्ठ वकील ने स्वीकार किया कि विवादित आदेश कानूनी रूप से गलत था और उसे कानून की नजर में अस्तित्वहीन माना जा सकता है। निगम ने अदालत को यह भी बताया कि वह विवादित आदेश और उसके बाद जारी लेजर रिपोर्ट वापस लेने के लिए तैयार है।
हाईकोर्ट ने नगर निगम को आदेश वापस लेने की अनुमति दे दी। हालांकि, अदालत ने यह नहीं माना कि इससे पूरा मामला खत्म हो जाता है।
पीठ ने कहा कि संबंधित अधिकारी ने उचित विचार-विमर्श किए बिना और लागू कानूनी प्रावधानों की सही जांच किए बगैर यांत्रिक तरीके से आदेश पारित किया। अदालत के अनुसार, वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे कानून के दायरे में रहकर निर्णय लें।
कोर्ट ने इस स्थिति को निराशाजनक बताया। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आदेश वापस लेने की सहमति से अधिकारी की गंभीर चूक को अनदेखा नहीं किया जा सकता। अधिकारियों को यह समझना होगा कि उनके फैसले केवल कागजों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि संबंधित पक्षों को कानूनी प्रक्रिया में उलझा सकते हैं।
सरकारी लापरवाही का बोझ जनता क्यों उठाए?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सरकारी मुकदमों पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जनता का पैसा खर्च होता है। यदि कोई अधिकारी कानून की सही जानकारी के बिना आदेश जारी करता है और उसके खिलाफ याचिका दायर होती है, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक बोझ पड़ता है।
इस मामले में भी अस्पताल को नगर निगम के आदेश को चुनौती देने के लिए अदालत का सहारा लेना पड़ा। हाईकोर्ट ने माना कि इस तरह की गलती से अदालत का कीमती समय बर्बाद हुआ।
पीठ ने अधिकारियों को आगाह किया कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही दोहराई नहीं जानी चाहिए। किसी भी सरकारी अधिकारी के लिए जरूरी है कि वह अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते समय संबंधित कानून की वैधता और लागू प्रावधानों की जांच करे।
इस टिप्पणी का व्यापक संदेश यह है कि सरकारी विभागों में काम करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है, जितनी आम नागरिकों से कानून का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।
अधिकारी पर 1 लाख रुपये का जुर्माना, रकम दो हिस्सों में बंटेगी
हाईकोर्ट ने भविष्य में ऐसी गलतियों को रोकने और जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से संबंधित नगर निगम अधिकारी पर कुल 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
अदालत ने निर्देश दिया कि इस रकम में से 75,000 रुपये मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा किए जाएं। शेष 25,000 रुपये याचिकाकर्ता अस्पताल को मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में दिए जाएंगे।
इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।
इस फैसले में अदालत ने साफ संदेश दिया कि सरकारी अधिकारियों को आदेश जारी करते समय कानून की अनदेखी करने की छूट नहीं दी जा सकती। यदि किसी आदेश का आधार ही ऐसे प्रावधान हों, जो पहले ही निरस्त किए जा चुके हैं, तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय हो सकती है। साथ ही, ऐसे मामलों में होने वाला अनावश्यक खर्च और न्यायिक समय की बर्बादी भी अदालत की नजर में गंभीर विषय हैं।