कंपनियों से जुड़े विवादों और दिवाला प्रक्रिया के मामलों की सुनवाई करने वाले NCLT और NCLAT में बुनियादी सुविधाओं की कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने दोनों ट्रिब्यूनलों के अध्यक्षों से कहा है कि वे इमारतों, जमीन, जरूरी सुविधाओं और कर्मचारियों की जरूरतों को लेकर विस्तृत प्रस्ताव तैयार करें। सुप्रीम कोर्ट को उम्मीद है कि यह जानकारी चार सप्ताह के भीतर पेश कर दी जाएगी। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि NCLT की मुख्य पीठ में बुनियादी ढांचे की स्थिति इतनी खराब है कि दो मंजिलें बंद हैं और अदालतें अपनी आधी क्षमता के साथ काम कर रही हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ सरकारी संस्थानों की सुविधाओं का नहीं, बल्कि उन कंपनियों और लोगों का भी है, जिन्हें अपने मामलों के निपटारे के लिए इन ट्रिब्यूनलों पर निर्भर रहना पड़ता है।
NCLT की दो मंजिलें बंद, आधी क्षमता से चल रहा काम
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को इस मामले की सुनवाई की। इस दौरान वरिष्ठ वकील संजीव सेन ने NCLT की मुख्य पीठ में बुनियादी सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया।
उन्होंने अदालत को बताया कि वहां का बुनियादी ढांचा गंभीर दबाव में है। स्थिति यह है कि दो मंजिलें बंद पड़ी हैं और ट्रिब्यूनल की अदालतें अपनी आधी क्षमता के साथ काम कर रही हैं। इसका असर रोजमर्रा की न्यायिक प्रक्रिया पर पड़ रहा है।
NCLT यानी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में कंपनियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण विवादों की सुनवाई होती है। वहीं, NCLAT यानी नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल, NCLT के फैसलों के खिलाफ अपील सुनने वाला प्रमुख मंच है।
ऐसे संस्थानों में जगह, कर्मचारियों और जरूरी सुविधाओं की कमी होने पर मामलों की सुनवाई और रिकॉर्ड के रखरखाव में व्यावहारिक दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। कंपनियों, लेनदारों और अन्य संबंधित पक्षों के लिए समय पर सुनवाई महत्वपूर्ण होती है। इसलिए इन ट्रिब्यूनलों की कार्यक्षमता का सीधा संबंध कारोबारी विवादों के निपटारे से भी है।
चार हफ्ते में बतानी होंगी इमारत, जमीन और स्टाफ की जरूरतें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NCLT और NCLAT के अध्यक्ष अपने-अपने संस्थानों की वास्तविक जरूरतों को सबसे बेहतर तरीके से समझते हैं। इसलिए दोनों से विस्तृत प्रस्ताव तैयार करने को कहा गया है।
इस प्रस्ताव में केवल इमारतों की स्थिति का ब्योरा देना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें जमीन, बुनियादी सुविधाओं और कर्मचारियों की जरूरतों का भी आकलन शामिल होना चाहिए। अदालत चाहती है कि दोनों संस्थानों के सुचारु संचालन के लिए किन संसाधनों की आवश्यकता है, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने आए।
पीठ ने उम्मीद जताई कि चार सप्ताह के भीतर यह प्रस्ताव अदालत के सामने रख दिया जाएगा। इसके बाद जरूरतों का आकलन करके आगे के कदमों पर विचार किया जा सकेगा।
इस निर्देश का महत्व इसलिए है, क्योंकि किसी ट्रिब्यूनल की क्षमता सिर्फ न्यायिक सदस्यों की संख्या से तय नहीं होती। पर्याप्त जगह, रिकॉर्ड संभालने वाले कर्मचारी और प्रशासनिक सहयोग भी जरूरी होते हैं। यदि इनमें कमी बनी रहती है, तो उपलब्ध न्यायिक संसाधनों का पूरा इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है।
हर पीठ में डिप्टी या ज्वाइंट रजिस्ट्रार की तैनाती पर विचार
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने NCLT से एक और अहम पहलू पर विचार करने को कहा। अदालत ने पूछा कि क्या प्रत्येक पीठ में न्यायिक रिकॉर्ड के रखरखाव और संबंधित कामकाज के लिए डिप्टी रजिस्ट्रार या ज्वाइंट रजिस्ट्रार स्तर के अधिकारी की नियुक्ति उपयोगी होगी।
ऐसे अधिकारियों की भूमिका रिकॉर्ड को व्यवस्थित रखने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुचारु बनाने में महत्वपूर्ण हो सकती है। अदालत का जोर इस बात पर है कि ट्रिब्यूनलों में केवल सुनवाई की व्यवस्था ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ा प्रशासनिक ढांचा भी मजबूत होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से स्पष्ट है कि संस्थानों की जरूरतों का आकलन करते समय कर्मचारियों की संख्या और उनकी जिम्मेदारियों को भी महत्व दिया जा रहा है। हालांकि, प्रत्येक पीठ में ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति का अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है। फिलहाल NCLT को इसकी उपयोगिता पर विचार करने के लिए कहा गया है।
सरकार, ट्रिब्यूनल और वकीलों की संयुक्त बैठक का सुझाव
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार, ट्रिब्यूनलों के नेतृत्व और बार के प्रतिनिधियों के बीच संयुक्त बैठक आयोजित की जाए। इस बैठक में जरूरतों की पहचान करके तय किया जा सकता है कि किन सुविधाओं को प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से भी NCLT और NCLAT को जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाने को कहा।
गौरतलब है कि इन ट्रिब्यूनलों में बुनियादी ढांचे, न्यायिक और तकनीकी सदस्यों तथा कर्मचारियों की कमी का मुद्दा पहले भी अदालत के सामने आ चुका है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में नियुक्तियों और अपर्याप्त सुविधाओं से जुड़े सवालों पर सुनवाई कर रहा है।
अब दोनों ट्रिब्यूनलों के अध्यक्षों से विस्तृत प्रस्ताव मिलने के बाद उनकी जरूरतों की तस्वीर अधिक स्पष्ट हो सकेगी। इसके बाद यह तय करने में मदद मिलेगी कि इमारतों, कर्मचारियों और प्रशासनिक संसाधनों के मामले में किन सुधारों की जरूरत है।
कंपनियों और आम लोगों के लिए इस पूरी प्रक्रिया का महत्व समय पर न्याय मिलने से जुड़ा है। बेहतर बुनियादी ढांचा और पर्याप्त स्टाफ ट्रिब्यूनलों के कामकाज को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद कर सकते हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने चार सप्ताह में प्रस्ताव पेश करने की अपेक्षा जताकर दोनों संस्थानों की व्यवस्थाओं में सुधार की दिशा में अगला कदम उठाया है।