उज्जैन में आयोजित ‘युवा धर्म संसद’ में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म को लेकर भारत की पारंपरिक समझ, जीवन में अहंकार की भूमिका, कमाई और सामाजिक जिम्मेदारी से लेकर पर्यावरण संरक्षण तक कई मुद्दों पर बात की। करीब 1,700 जेन जी प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में धर्म को केवल किसी एक पूजा-पद्धति या संप्रदाय के रूप में नहीं देखा गया है। उनके मुताबिक, भारतीय संदर्भ में धर्म का संबंध व्यक्ति के आचरण, जिम्मेदारी और समाज के साथ उसके व्यवहार से भी है। उन्होंने यह बात ऐसे समय में कही, जब युवाओं के बीच धर्म जैसे विषय पर चर्चा को लेकर भी अलग-अलग धारणाएं हैं।
‘सूरज उगा है तो अस्त भी होगा’, अहंकार पर भागवत की बात
भागवत ने अपने संबोधन में अहंकार को समझाने के लिए सूरज का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि सूरज का उगना और डूबना किसी व्यक्ति की इच्छा से तय नहीं होता। कोई उस पर विश्वास करे या न करे, सूरज अपने नियम के अनुसार उगेगा और अस्त होगा।
इसी उदाहरण के जरिए उन्होंने कहा कि इंसान कई बार अपने अहंकार में यह मानने लगता है कि दुनिया उसकी इच्छा और नियंत्रण के मुताबिक चलेगी। यही सोच उसे उन चीजों पर भी अधिकार समझने की ओर ले जाती है, जो वास्तव में उसके नियंत्रण में नहीं हैं।
भागवत ने युवाओं को यह संदेश भी दिया कि धर्म को समझने के लिए पूर्वाग्रहों से बाहर निकलना जरूरी है। उनके मुताबिक, धर्म केवल मान्यता का विषय नहीं है, बल्कि उसे व्यवहार और आचरण में दिखाई देना चाहिए।
धर्म और ‘रिलिजन’ को एक जैसा मानना सही नहीं: भागवत
अपने संबोधन में भागवत ने धर्म और पश्चिमी अर्थों में इस्तेमाल होने वाले ‘रिलिजन’ के बीच अंतर समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में धर्म की अवधारणा पश्चिमी देशों में विकसित धार्मिक अवधारणा से अलग रही है।
उन्होंने कहा कि भारत में राज्य की परंपरा को समावेशी माना गया है और यहां अलग-अलग पंथों के साथ भेदभाव न करने की सोच रही है। उनके अनुसार, भारतीय संदर्भ में पंथ-निरपेक्षता को इसी दृष्टि से समझना चाहिए।
भागवत ने यह भी कहा कि पश्चिमी देशों में सेक्युलरिज्म की अवधारणा शासकों और धार्मिक प्राधिकारों के बीच संघर्ष की पृष्ठभूमि में विकसित हुई। इसलिए भारतीय संदर्भ में उसे उसी तरह देखना उचित नहीं है।
उन्होंने धर्म को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन से जोड़ते हुए कहा कि धर्म व्यक्ति और समाज के जीवन को दिशा देने वाला सिद्धांत है। उनके मुताबिक, धर्म का उद्देश्य केवल किसी चीज की तलाश करना नहीं, बल्कि सत्य को पहचानकर उसे अपने आचरण में उतारना है।
कमाई कितनी हो? भागवत ने पैसे के साथ जिम्मेदारी का भी दिया संदेश
भागवत ने आर्थिक जीवन पर भी युवाओं से बात की। उन्होंने कहा कि धन कमाने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन व्यक्ति को अपनी जरूरत के मुताबिक ही धन अपने पास रखना चाहिए और बाकी को दूसरों के साथ साझा करने की भावना भी होनी चाहिए।
उनका जोर इस बात पर था कि किसी व्यक्ति की आजीविका दूसरे लोगों के लिए परेशानी या नुकसान का कारण नहीं बननी चाहिए। यानी आर्थिक तरक्की सिर्फ व्यक्तिगत कमाई तक सीमित न हो, बल्कि उससे समाज के दूसरे लोगों के जीवन में भी सुधार आए।
उन्होंने परिवार और काम के बीच बढ़ते असंतुलन का उदाहरण देते हुए कहा कि अधिक कमाई की दौड़ में अगर व्यक्ति अपने परिवार से ही दूर हो जाए तो इस तरह के विकास पर सवाल उठता है। उन्होंने ऐसे लोगों का जिक्र किया जो सुबह जल्दी घर से निकलते हैं और रात में देर से लौटते हैं। नतीजा यह होता है कि उनके बच्चे उन्हें पर्याप्त समय तक देख ही नहीं पाते।
प्रकृति की रक्षा भी धर्म का हिस्सा, युवाओं से दूसरे मतों के सम्मान की अपील
भागवत ने धर्म को पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि प्रकृति की रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है और जंगलों का विनाश तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना अधर्म की श्रेणी में आता है।
उन्होंने युवाओं से अपनी परंपराओं के प्रति प्रतिबद्ध रहने के साथ-साथ दूसरे लोगों की उपासना पद्धतियों का सम्मान करने की अपील की। उनके अनुसार, भारत की परंपरा अलग-अलग लोगों को बांटने के बजाय उन्हें जोड़ने की रही है।
भागवत ने न्यूयॉर्क, टोरंटो और लंदन की अपनी हालिया यात्राओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि वहां कुछ उद्यमी इस बात को लेकर चिंतित थे कि उनके कारोबार से केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि किसी स्तर पर लोगों को परेशानी भी हो सकती है।
पूरे संबोधन में भागवत का जोर इस बात पर रहा कि जीवन को केवल व्यक्तिगत सफलता, अधिक कमाई या अधिकार के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। व्यक्ति की तरक्की के साथ परिवार, समाज और प्रकृति के प्रति उसकी जिम्मेदारी भी जुड़ी है। युवा धर्म संसद में दिए गए उनके संदेश का एक बड़ा हिस्सा इसी संतुलन पर केंद्रित रहा।



