पंजाब BJP में बढ़ी अंदरूनी कलह, 120 से ज्यादा इस्तीफों ने बढ़ाई टेंशन, दिल्ली ने ढिल्लों को किया तलब

पंजाब BJP में बढ़ी अंदरूनी कलह, 120 से ज्यादा इस्तीफों ने बढ़ाई टेंशन, दिल्ली ने ढिल्लों को किया तलब

पंजाब बीजेपी में संगठनात्मक फेरबदल के बाद शुरू हुआ विरोध अब पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है। जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों को लेकर कई पुराने और वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आई है। कई जिलों में पदाधिकारियों ने सामूहिक इस्तीफे दिए हैं और अब तक 120 से ज्यादा नेताओं और कार्यकर्ताओं के संगठनात्मक पद छोड़ने की बात सामने आई है। सबसे ज्यादा असर होशियारपुर में दिखा, जहां 111 पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया। बढ़ते असंतोष को देखते हुए बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों को दिल्ली बुलाकर स्थिति संभालने के निर्देश दिए हैं। पार्टी की कोशिश है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह विवाद बड़ा संगठनात्मक संकट न बन जाए।

नई टीम बनी और पुराने नेताओं में नाराजगी शुरू

पंजाब बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने अपनी नई संगठनात्मक टीम का ऐलान किया। इसके बाद ही अलग-अलग जिलों से विरोध की खबरें आने लगीं। खासकर उन नेताओं में नाराजगी ज्यादा दिखाई दी, जो लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े रहे हैं और संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं।

पुराने नेताओं की शिकायत है कि संगठन में नई नियुक्तियों के दौरान उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं मिला। उनका आरोप है कि दूसरी पार्टियों से बीजेपी में आए नेताओं और नए चेहरों को प्राथमिकता दी जा रही है।

इसी मुद्दे ने कई जिलों में असंतोष को जन्म दिया। होशियारपुर, लुधियाना, फरीदकोट, खन्ना, मुक्तसर और संगरूर जैसे जिलों में संगठनात्मक बदलाव को लेकर विरोध सामने आया है।

होशियारपुर में सबसे बड़ा झटका, 111 पदाधिकारियों ने छोड़े पद

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर होशियारपुर में देखने को मिला। यहां जिला अध्यक्ष पद पर बदलाव को लेकर पुराने नेताओं ने कड़ा विरोध जताया। सतीश बावा को हटाकर नितिन गुप्ता ‘नन्नू’ को जिला अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में असंतोष बढ़ा।

पंजाब बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री तीक्ष्ण सूद ने इस बदलाव के विरोध में अपने संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया। उनके समर्थन में 111 स्थानीय पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने भी सामूहिक इस्तीफे सौंप दिए।

इनमें मंडल अध्यक्ष, जिला सचिव और विभिन्न मोर्चों से जुड़े पदाधिकारी शामिल बताए जा रहे हैं। यह संख्या पार्टी नेतृत्व के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक नेता की नाराजगी नहीं, बल्कि जमीनी संगठन के एक हिस्से में असंतोष की ओर इशारा करती है।

फरीदकोट में भी जिला अध्यक्ष बदले जाने के बाद करीब 10 वरिष्ठ पदाधिकारियों ने संगठनात्मक जिम्मेदारियों से इस्तीफा दिया। लुधियाना, खन्ना और संगरूर समेत दूसरे जिलों में भी इसी तरह की नाराजगी सामने आई है।

छह जिला अध्यक्ष बदले, दो हफ्ते में बढ़ा विवाद

पार्टी के अंदर असंतोष की एक वजह संगठनात्मक बदलाव की रफ्तार को भी माना जा रहा है। महज करीब दो सप्ताह के भीतर छह जिला अध्यक्षों को बदलने के फैसले ने पुराने नेताओं के बीच सवाल खड़े किए हैं।

नाराज नेताओं का कहना है कि लंबे समय से संगठन में काम कर रहे कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ पदाधिकारियों से पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया गया। अब केंद्रीय नेतृत्व की कोशिश है कि इस नाराजगी को बातचीत के जरिए दूर किया जाए।

बीजेपी नेतृत्व उन नेताओं को दोबारा संगठन से जोड़ना चाहता है, जिन्होंने इस्तीफा दिया है। साथ ही वरिष्ठ नेताओं को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की जा रही है कि पार्टी में उनकी भूमिका और सम्मान कायम रहेगा।

आगे होने वाली संगठनात्मक नियुक्तियों में भी वरिष्ठ नेताओं से ज्यादा व्यापक स्तर पर सलाह लेने की संभावना जताई जा रही है। मकसद साफ है—फैसले संगठन के भीतर असंतोष का नया कारण न बनें।

दिल्ली ने संभाली कमान, 2027 से पहले डैमेज कंट्रोल

विवाद बढ़ने के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों को दिल्ली बुलाया। उन्हें संगठन में पैदा हुए असंतोष को जल्द नियंत्रित करने और नाराज नेताओं से संवाद बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।

केंद्रीय नेतृत्व नहीं चाहता कि पंजाब में संगठनात्मक मतभेद इतना बढ़ें कि उसका असर आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी पर पड़े। पार्टी अब सभी गुटों और वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर जोर दे रही है।

दिल्ली से लौटने के बाद केवल सिंह ढिल्लों ने पार्टी के रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि बीजेपी अब पंजाब में कुछ चुनिंदा सीटों तक सीमित रहने के बजाय सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। उनके मुताबिक कार्यकर्ताओं का मनोबल मजबूत है और संगठन के भीतर चल रहा टकराव पार्टी का अंदरूनी मामला है, जिसे बातचीत के जरिए सुलझा लिया जाएगा।

ढिल्लों ने नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को सम्मान देने की बात भी कही है। उनका कहना है कि किसी भी नेता या कार्यकर्ता को पार्टी से अलग-थलग नहीं होने दिया जाएगा और जल्द ही नाराज लोगों को मनाने की कोशिश की जाएगी।

फिलहाल बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस्तीफा दे चुके नेताओं को वापस संगठन से जोड़ने और पुराने कार्यकर्ताओं का भरोसा कायम करने की है। पंजाब जैसे राज्य में जहां पार्टी 2027 के चुनाव में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी कर रही है, वहां संगठन की एकजुटता बेहद महत्वपूर्ण होगी।

अब देखना यह है कि दिल्ली की दखल के बाद पार्टी का यह अंदरूनी विवाद कितनी जल्दी शांत होता है और क्या नाराज वरिष्ठ नेता दोबारा संगठन की जिम्मेदारियां संभालने के लिए तैयार होते हैं।