अनुकंपा नियुक्ति के तहत सरकारी नौकरी मिलने पर अगर कोई कर्मचारी निचले पद पर काम करना शुरू कर देता है, तो क्या वह बाद में अपनी पसंद के ऊंचे पद की मांग कर सकता है? राजस्थान हाईकोर्ट ने इस सवाल पर अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि बिना किसी आपत्ति के निचला पद स्वीकार करने और उस पर करीब दो साल तक काम करने के बाद उच्च पद पर नियुक्ति का दावा नहीं किया जा सकता। अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति ने कंडक्टर के पद पर नियुक्ति स्वीकार करने के बाद सहायक यातायात निरीक्षक (Assistant Traffic Inspector) के पद की मांग की थी। यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो परिवार में कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन करते हैं।
पहले कंडक्टर की नौकरी स्वीकार की, फिर मांगी ऊंची पोस्ट
यह मामला अविनाश भटनागर बनाम राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम एवं अन्य से जुड़ा है। मामले की सुनवाई जस्टिस बिपिन गुप्ता की पीठ ने की।
याचिकाकर्ता ने साल 2013 में अनुकंपा नियुक्ति के तहत मिली कंडक्टर की नौकरी स्वीकार की थी। इसके बाद उसने करीब दो साल तक इस पद पर काम भी किया। हालांकि, बाद में उसने सहायक यातायात निरीक्षक के पद पर नियुक्ति की मांग उठाई और साल 2015 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, उसने शुरुआत में सहायक यातायात निरीक्षक के पद के लिए आवेदन किया था। लेकिन जब उसका आवेदन विचाराधीन था, तब संबंधित नियमों में बदलाव कर दिया गया। इस बदलाव के चलते वह पद अनुकंपा नियुक्ति के लिए उपलब्ध नहीं रहा और उसे कंडक्टर की नौकरी दी गई।
बाद में नियमों में फिर संशोधन हुआ और सहायक यातायात निरीक्षक का पद दोबारा अनुकंपा नियुक्ति के लिए उपलब्ध हो गया। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने उच्च पद पर नियुक्ति की मांग की।
याचिकाकर्ता ने नियमों का हवाला देकर क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता का तर्क था कि उसके पिता की मृत्यु के समय जो नियम लागू थे, उन्हीं के आधार पर उसकी नियुक्ति के दावे पर विचार किया जाना चाहिए। उसके अनुसार, उन नियमों के तहत सहायक यातायात निरीक्षक का पद उपलब्ध था। इसलिए बाद में किए गए संशोधनों के आधार पर उसके दावे को खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, राजस्थान सरकार ने इस मांग का विरोध किया। राज्य की ओर से कहा गया कि अनुकंपा नियुक्ति किसी व्यक्ति को उसकी पसंद के पद पर नौकरी पाने का स्वतः अधिकार नहीं देती। इसका उद्देश्य परिवार में कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद उत्पन्न आर्थिक संकट में सहायता करना है। यह नियमित भर्ती प्रक्रिया का विकल्प नहीं है।
सरकार ने यह भी दलील दी कि याचिकाकर्ता ने कंडक्टर का पद बिना किसी आपत्ति के स्वीकार किया था। वह करीब दो साल तक उस पद पर काम करता रहा और इसके बाद उच्च पद की मांग लेकर अदालत पहुंचा। राज्य के अनुसार, उसकी याचिका देरी से दायर की गई थी और इस आधार पर भी उसकी मांग स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने क्यों कहा- ऊंचे पद का अधिकार नहीं बनता?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति से किसी व्यक्ति को सरकारी नौकरी या किसी खास पद पर नियुक्ति का स्थायी और सुनिश्चित अधिकार नहीं मिल जाता।
अदालत ने कहा कि परिवार के किसी कर्मचारी की मृत्यु होने का मतलब यह नहीं है कि उसके आश्रित को उसकी पसंद का पद ही दिया जाए। इसी तरह, किसी उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता या किसी पद के लिए उसकी पात्रता मात्र से उसे उस पद पर नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता।
पीठ ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता के पास नियुक्ति पत्र मिलने के समय ही संबंधित निर्णय को चुनौती देने का विकल्प था। वह कंडक्टर का पद स्वीकार करते हुए यह भी स्पष्ट कर सकता था कि उच्च पद पर विचार किए जाने का उसका दावा सुरक्षित रहेगा। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और बिना किसी आपत्ति के नियुक्ति स्वीकार कर ली।
अदालत के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने निचले पद पर काम भी किया। ऐसे में बाद में उच्च पद पर नियुक्ति की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी लिया सहारा, याचिका खारिज
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के मामले Director of Town Panchayat & Others v. M. Jayabal & Others का भी हवाला दिया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में यह सिद्धांत सामने आया था कि अनुकंपा नियुक्ति के तहत निचला पद स्वीकार कर लेने के बाद कर्मचारी सामान्य तौर पर बाद में उच्च पद पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर विचार करने के लिए कौन-सी तारीख और कौन-से नियम प्रासंगिक होंगे, यह संबंधित कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करता है। आम तौर पर कर्मचारी की मृत्यु के समय लागू नियम महत्वपूर्ण होते हैं। हालांकि, मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता द्वारा बिना आपत्ति निचला पद स्वीकार करना और लगभग दो साल तक उस पर काम करना निर्णायक पहलू रहा।
इन्हीं तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
आम कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए क्या मायने हैं?
इस फैसले से यह बात सामने आती है कि अनुकंपा नियुक्ति का प्रस्ताव मिलने पर पद और नियुक्ति की शर्तों को ध्यान से समझना जरूरी है। यदि किसी उम्मीदवार को उसकी अपेक्षा से अलग पद दिया जाता है, तो उसे स्वीकार करने से पहले संबंधित नियमों और उपलब्ध कानूनी विकल्पों की जानकारी लेनी चाहिए। बाद में पद बदलने या उच्च पद पर नियुक्ति की मांग करने पर सफलता की गारंटी नहीं होती।
हालांकि, हर मामले का फैसला उसके तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर होता है। इसलिए इस फैसले को सभी परिस्थितियों में उच्च पद के दावे पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।



