PMLA की एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी में ज्यूडिशियल मेंबर जरूरी या नहीं? सिंगल बेंच पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

PMLA की एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी में ज्यूडिशियल मेंबर जरूरी या नहीं? सिंगल बेंच पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

PMLA यानी Prevention of Money Laundering Act के तहत संपत्ति अटैचमेंट की पुष्टि करने वाली एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम कानूनी सवाल उठा है। क्या यह अथॉरिटी सिंगल-मेंबर बेंच के तौर पर काम कर सकती है? और क्या इस बेंच में ज्यूडिशियल मेंबर का होना अनिवार्य है? सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इन सवालों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इन मामलों की सुनवाई कर रही थी। विवाद का संबंध PMLA की धारा 6 के तहत गठित एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी से है। यही अथॉरिटी प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की ओर से किए गए प्रॉपर्टी अटैचमेंट की पुष्टि से जुड़े मामलों पर फैसला करती है।

मामले में PMLA की धारा 5 के दूसरे प्रोविज़ो की संवैधानिक वैधता और धारा 5(1) या धारा 8(1) की कथित प्रक्रियात्मक कमियों से जुड़े सवाल भी शामिल हैं।

जस्टिस बागची का सवाल—6 महीने में 3,000 से 5,000 मामलों पर कितना ध्यान?

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक व्यावहारिक सवाल उठाया। PMLA के तहत अटैच की गई संपत्ति की पुष्टि के लिए कानून में 180 दिनों की समय-सीमा है। ऐसे में अगर अथॉरिटी के सामने बहुत बड़ी संख्या में मामले हों, तो क्या हर मामले पर वास्तव में पर्याप्त तरीके से विचार किया जा सकता है?

उन्होंने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक से इसी संदर्भ में सवाल किया। जस्टिस बागची ने कहा कि एक ट्रिब्यूनल के सामने छह महीने में करीब 3,000 मामलों पर विचार करने की स्थिति हो सकती है। उन्होंने यह भी पूछा कि अगर किसी अथॉरिटी में तीन, दो या सिर्फ एक सदस्य हों और उनके सामने हजारों मामले हों, तो क्या हर केस पर पर्याप्त रूप से दिमाग लगाया जा सकेगा या फिर आदेशों पर केवल हस्ताक्षर करने की स्थिति बन सकती है।

यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि संपत्ति अटैचमेंट का सीधा असर संबंधित व्यक्ति या संस्था की संपत्ति के इस्तेमाल पर पड़ सकता है।

8,851 मामलों में सिर्फ 60 ट्रायल तक पहुंचे? कोर्ट में आंकड़ों पर हुई बहस

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुनवाई के दौरान ED के मामलों से जुड़े आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि एक समयावधि में ED की ओर से शुरू किए गए 8,851 मामलों में से केवल 60 मामले ही ट्रायल तक पहुंचे

उनका तर्क था कि इन मामलों में PMLA के तहत संपत्ति अटैचमेंट जैसे प्रावधान लागू हो सकते हैं। यानी किसी मामले में अंतिम ट्रायल शुरू होने से पहले ही संबंधित संपत्ति पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।

वरिष्ठ वकील ने इसी संदर्भ में एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी की भूमिका पर सवाल उठाया। उनके मुताबिक किसी संपत्ति को लंबे समय तक फ्रीज या अटैच करने का असर गंभीर हो सकता है, खासकर तब जब संबंधित मामला बाद में ट्रायल तक ही न पहुंचे।

हालांकि, ASG अनिल कौशिक ने इन आंकड़ों पर आपत्ति जताई और कहा कि यह संख्या सही प्रतीत नहीं होती। इस पर शंकरनारायणन ने जवाब दिया कि ये आंकड़े ED की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

इसके बाद जस्टिस बागची ने यह जानना चाहा कि देशभर में कितने मामलों में अटैचमेंट हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सवाल सिर्फ उन मामलों का नहीं है जो ट्रायल तक पहुंचे हैं, बल्कि कुल अटैचमेंट की संख्या जानना महत्वपूर्ण है। शंकरनारायणन ने अदालत को 3,501 अटैचमेंट का आंकड़ा बताया।

क्या सिंगल-मेंबर अथॉरिटी कानून के मुताबिक है?

मामले का दूसरा बड़ा सवाल एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी की संरचना से जुड़ा है। अलग-अलग हाईकोर्ट के फैसलों के खिलाफ ये मामले सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। इनमें दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का फैसला भी शामिल है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने PMLA की धारा 5(1) के दूसरे प्रोविज़ो की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। साथ ही, हाईकोर्ट के सामने यह सवाल भी था कि क्या एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी और अपीलेट ट्रिब्यूनल की सिंगल-मेंबर बेंच PMLA के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है।

हाईकोर्ट ने माना था कि PMLA के तहत एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी और अपीलेट ट्रिब्यूनल की सिंगल-मेंबर बेंच हो सकती है। इसके अलावा, ऐसी बेंच में ज्यूडिशियल मेंबर का होना अनिवार्य नहीं माना गया। हाईकोर्ट के अनुसार इसमें एडमिनिस्ट्रेटिव मेंबर भी हो सकता है।

इसी फैसले से जुड़े एक मामले में ED की ओर से दायर स्पेशल लीव पिटीशन में हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष पर रोक लगाई गई थी, जिसमें रिट याचिकाओं को सुनवाई योग्य माना गया था।

इन मामलों को विजय मदनलाल चौधरी फैसले की समीक्षा की मांग करने वाली याचिकाओं के साथ जोड़कर सुनने का अनुरोध भी किया गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया।

अब सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। मामला Mukesh Kumar and Anr. v. Union of India and Ors., SLP(C) No. 32234/2026 के तौर पर दर्ज है। अदालत का फैसला यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि PMLA के तहत एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी किस संरचना में काम कर सकती है और संपत्ति अटैचमेंट से जुड़े मामलों में उसकी प्रक्रिया को किस तरह देखा जाएगा।