सड़क हादसों में घायल होने वाले बच्चों के मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर भविष्य में आने वाले कई मामलों पर पड़ सकता है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि किसी बच्चे को मुआवजा तय करते समय केवल उसकी मेडिकल डिसेबिलिटी (शारीरिक विकलांगता) नहीं देखी जानी चाहिए, बल्कि यह भी समझना होगा कि उस हादसे ने उसके पूरे भविष्य, करियर और कमाने की क्षमता पर कितना असर डाला है।
इसी सोच के साथ सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने की बच्ची को सड़क हादसे में हुई गंभीर चोट के मामले में मिलने वाला मुआवजा ₹45.40 लाख से बढ़ाकर ₹83.38 लाख कर दिया। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि पीड़िता को दावा दाखिल करने की तारीख से भुगतान होने तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया जाएगा।
‘बच्चे की आज की नहीं, छिन चुके भविष्य की कीमत लगानी होगी’
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि बच्चों के मामलों में मुआवजे का आकलन सामान्य तरीके से नहीं किया जा सकता। यदि कोई बच्चा स्थायी रूप से दिव्यांग हो जाता है, तो अदालत को यह देखना होगा कि भविष्य में उसकी शिक्षा, रोजगार, आत्मनिर्भरता और सामान्य जीवन पर उसका कितना प्रभाव पड़ेगा।
कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना के समय बच्चा कमाने वाला नहीं था, इसलिए उसे केवल “नॉन-अर्निंग” व्यक्ति मान लेना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में उस भविष्य को ध्यान में रखना होगा, जो हादसे की वजह से हमेशा के लिए खत्म हो गया।
90% मेडिकल डिसेबिलिटी, लेकिन 100% फंक्शनल डिसेबिलिटी माना
यह मामला वर्ष 2015 का है। सड़क दुर्घटना के समय पीड़ित बच्ची की उम्र केवल छह महीने थी। हादसे में उसकी रीढ़ की हड्डी गंभीर रूप से घायल हो गई थी। बाद में डॉक्टरों ने उसे पोस्ट ट्रॉमा मायलोपैथी विद पैराप्लेजिया से पीड़ित बताया। मेडिकल रिपोर्ट में उसकी स्थायी शारीरिक विकलांगता 90 प्रतिशत आंकी गई थी।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेडिकल डिसेबिलिटी और फंक्शनल डिसेबिलिटी अलग-अलग होती हैं। अदालत ने माना कि बच्ची भविष्य में किसी भी तरह का रोजगार करने की स्थिति में नहीं होगी। उसकी कमाने की क्षमता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इसलिए इस मामले में उसकी फंक्शनल डिसेबिलिटी 100 प्रतिशत मानी जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि मुआवजे का सबसे महत्वपूर्ण आधार यही होना चाहिए कि घायल व्यक्ति की भविष्य में जीवनयापन करने की क्षमता कितनी प्रभावित हुई है।
हाईकोर्ट के फैसले में किया बड़ा बदलाव
इससे पहले मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने मुआवजा तय किया था, जिसे बाद में ओडिशा हाईकोर्ट ने संशोधित करते हुए ₹45.40 लाख कर दिया। लेकिन बच्ची की मां ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर कहा कि यह राशि उसकी पूरी जिंदगी की जरूरतों और भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए पर्याप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के फैसले में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए। अदालत ने 15 की जगह 18 का मल्टीप्लायर लागू किया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों के मामलों में काल्पनिक आय (Notional Income) तय करते समय अकुशल मजदूर की मजदूरी नहीं, बल्कि संबंधित राज्य के कुशल श्रमिक (Skilled Worker) की न्यूनतम मजदूरी को आधार बनाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि एमएसीटी और हाईकोर्ट दोनों ने इस पहलू पर उचित दृष्टिकोण नहीं अपनाया था।
भविष्य के मामलों के लिए भी अहम मिसाल बना फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पहले दिए गए काजल बनाम जगदीश चंद और बेबी साक्षी ग्रेओला जैसे मामलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने दोहराया कि जिन बच्चों को गंभीर और स्थायी चोटें पहुंचती हैं, उनके मामलों में सामान्य मुआवजा तय करने के सिद्धांत पर्याप्त नहीं होते।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे बच्चों ने केवल अपनी शारीरिक क्षमता नहीं खोई होती, बल्कि उनका पूरा भविष्य बदल जाता है। इसलिए अदालतों को मुआवजा तय करते समय जीवनभर की चिकित्सा, देखभाल, आर्थिक निर्भरता और सामान्य जीवन जीने की क्षमता को भी ध्यान में रखना चाहिए।
यह फैसला केवल एक परिवार को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायल होने वाले बच्चों के मामलों में मुआवजा तय करने के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल भी बन सकता है।



