गुजरात में जिला जजों की भर्ती को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला अब अहम मोड़ पर है। 113 पदों पर भर्ती के लिए पूरी चयन प्रक्रिया होने के बावजूद एक भी उम्मीदवार की नियुक्ति नहीं हुई। खास बात यह है कि लिखित परीक्षा और अन्य चरणों के बाद केवल दो उम्मीदवार ही इंटरव्यू तक पहुंचे थे। लेकिन दोनों ही उम्मीदवार 50 अंकों के इंटरव्यू में जरूरी 20 अंक हासिल नहीं कर सके। अब इसी प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट को नोटिस जारी किया है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने शुक्रवार को याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई के बाद नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पक्ष रखा। मामला Mansi Jain & Anr. v. Registrar General, High Court of Gujarat, W.P.(C) No. 925/2026 है।
113 पदों की भर्ती, लेकिन एक भी नियुक्ति नहीं
गुजरात हाईकोर्ट ने 25 जुलाई 2025 को जिला जजों के 113 पदों पर 25 फीसदी डायरेक्ट रिक्रूटमेंट कोटे के तहत भर्ती का विज्ञापन जारी किया था। चयन प्रक्रिया में प्रारंभिक परीक्षा, गुजराती भाषा परीक्षा, मुख्य लिखित परीक्षा और फिर वाइवा-वॉइस यानी इंटरव्यू शामिल था।
प्रारंभिक परीक्षा में 729 उम्मीदवार शामिल हुए। इनमें से सिर्फ 31 उम्मीदवार मुख्य परीक्षा के लिए योग्य पाए गए। आगे की प्रक्रिया में केवल दो उम्मीदवार ही इंटरव्यू तक पहुंच सके।
30 अप्रैल 2026 को इन दोनों का वाइवा हुआ। इसके बाद 9 जुलाई 2026 को अंतिम परिणाम जारी किया गया। लेकिन परिणाम में किसी भी उम्मीदवार को नियुक्ति के लिए अनुशंसित नहीं किया गया। यानी विज्ञापित सभी 113 पद खाली रह गए।
याचिका में इसी फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि उन्हें असफल घोषित करने वाले परिणाम को इस हद तक रद्द किया जाए और चयन प्रक्रिया का निष्पक्ष, पारदर्शी तरीके से दोबारा मूल्यांकन कराया जाए।
लिखित परीक्षा में प्रदर्शन के बाद इंटरव्यू ने बदली पूरी तस्वीर
याचिका में दोनों उम्मीदवारों के अंकों को भी प्रमुखता से रखा गया है। मंसी जैन ने 200 अंकों की लिखित परीक्षा में 100.5 अंक हासिल किए थे। लेकिन वाइवा में उन्हें 50 में सिर्फ 9.6 अंक मिले।
दूसरे याचिकाकर्ता विशाल बलजीत सिंह ने लिखित परीक्षा में 110.5 अंक हासिल किए। इंटरव्यू में उन्हें 10 अंक मिले। जबकि क्वालीफाई करने के लिए वाइवा में कम से कम 20 अंक जरूरी थे।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इंटरव्यू के प्रदर्शन ने लिखित परीक्षा में हासिल किए गए अंकों को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी कर दिया। उनका कहना है कि मौखिक इंटरव्यू स्वभाव से व्यक्तिपरक होता है, इसलिए उसे चयन में जरूरत से ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।
इसी संदर्भ में याचिका में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले Ajay Hasia v. Khalid Mujib Sehravardi का भी हवाला दिया गया है। इसमें इंटरव्यू की व्यक्तिपरक प्रकृति को लेकर सिद्धांतों पर चर्चा की गई थी।
सिर्फ 5 मिनट का इंटरव्यू? प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने इंटरव्यू की अवधि को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि याचिकाकर्ताओं का वाइवा लगभग पांच मिनट में ही पूरा हो गया।
याचिका में न्यायिक नियुक्तियों से जुड़े जस्टिस शेट्टी आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि ऐसे इंटरव्यू सामान्य तौर पर 25 से 30 मिनट तक चलने चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि वाइवा में कटऑफ अंक नहीं होने चाहिए।
मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल इंटरव्यू पैनल को लेकर उठाया गया है। भूषण के अनुसार, पांच हाईकोर्ट जजों की वही समिति 25 फीसदी डायरेक्ट रिक्रूटमेंट, 25 फीसदी लिमिटेड डिपार्टमेंटल कॉम्पिटिटिव एग्जाम यानी LDCE और 50 फीसदी रेगुलर प्रमोशन कोटे के लिए इंटरव्यू ले रही थी।
याचिका में दावा किया गया है कि LDCE कोटे में न्यूनतम वाइवा अंक हासिल नहीं करने वाले नौ न्यायिक अधिकारियों को बाद में रेगुलर प्रमोशन कोटे के तहत सफल घोषित किया गया। याचिकाकर्ताओं ने इसे चयन प्रक्रिया में संभावित असंगति के तौर पर उठाया है।
सात साल में 264 पद, नियुक्ति सिर्फ एक—अब सुप्रीम कोर्ट में मामला
याचिका में गुजरात हाईकोर्ट की पिछले सात वर्षों की जिला जज भर्ती प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है। इसके मुताबिक 25 फीसदी डायरेक्ट रिक्रूटमेंट कोटे के तहत पांच भर्ती प्रक्रियाओं में कुल 264 पद अधिसूचित किए गए।
इनमें 2019 में 26, 2020 में 34, 2022 में 34, 2023 में 57 और 2024-25 में 113 पद शामिल थे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस अवधि में इस कोटे से सिर्फ एक नियुक्ति हुई।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल केवल दो उम्मीदवारों के परिणाम का नहीं है। मामला यह भी है कि बड़ी संख्या में पद खाली रहने के बावजूद चयन प्रक्रिया में किसी उम्मीदवार की नियुक्ति क्यों नहीं हुई और इंटरव्यू के मूल्यांकन की निष्पक्षता को किस तरह परखा जाए।
याचिकाकर्ताओं ने अंतरिम राहत की भी मांग की है। वे चाहते हैं कि 9 जुलाई के परिणाम पर रोक लगाई जाए और मामले की सुनवाई पूरी होने तक गुजरात हाईकोर्ट को इन 113 पदों के लिए नई भर्ती प्रक्रिया शुरू करने या इन पदों को भरने से रोका जाए।
सुप्रीम कोर्ट का नोटिस जारी होना फिलहाल मामले में अंतिम फैसला नहीं है। अदालत के सामने अब भर्ती प्रक्रिया, इंटरव्यू के मूल्यांकन और याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर आगे सुनवाई होगी। इस मामले का असर केवल इन दो उम्मीदवारों तक सीमित नहीं है, क्योंकि इसके केंद्र में न्यायिक भर्ती में पारदर्शिता और चयन के मानकों से जुड़े सवाल भी हैं।




