पश्चिम बंगाल की राजनीति में अक्सर रसूख, बड़े नाम और सियासी विरासत की चर्चा होती है, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव नतीजों ने एक ऐसी कहानी को जन्म दिया है जो लोकतंत्र की असली ताकत का अहसास कराती है। यह कहानी है कालिता मांझी की, जो कल तक दूसरों के घरों में बर्तन मांजती थीं और साफ-सफाई का काम करती थीं, लेकिन आज उनके नाम के आगे ‘विधायक’ लग चुका है। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत के बीच कालिता की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो गरीबी और अभाव का कोई भी रोड़ा आपकी मंजिल नहीं रोक सकता।
₹2500 की मासिक आय और संघर्षों से भरा सफर
कालिता मांझी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। आउसग्राम विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरीं कालिता गुस्कारा नगर पालिका इलाके की रहने वाली हैं। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि वह गुजारे के लिए चार अलग-अलग घरों में काम करती थीं, जिससे उन्हें महीने के करीब 2,500 से 4,500 रुपये ही मिल पाते थे। उनके पति पेशे से प्लंबर हैं और परिवार की सामाजिक स्थिति बेहद साधारण रही है।
राजनीति में कालिता का प्रवेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों से मिली प्रेरणा का नतीजा था। घरों में काम करने की थकान के बीच भी वह बीजेपी के कार्यक्रमों में सक्रिय रहती थीं। साल 2021 के चुनाव में भी पार्टी ने उन पर भरोसा जताया था, लेकिन तब वह तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार से हार गई थीं। हार के बावजूद उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा और उनकी यही जिद इस बार इतिहास रचने का जरिया बनी।
1 लाख से ज्यादा वोट और 12 हजार का अंतर: ऐसे मिली जीत
इस बार के चुनाव में कालिता मांझी ने न केवल जीत दर्ज की, बल्कि भारी जनसमर्थन हासिल कर विरोधियों को चौंका दिया। उन्होंने आउसग्राम सीट पर 1,07,692 वोट पाकर अपनी ताकत दिखाई। कालिता ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी श्यामा प्रसन्ना लोहार को 12,535 वोटों के बड़े अंतर से करारी शिकस्त दी। यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि यह समाज के उस तबके की जीत मानी जा रही है जो दशकों से मुख्यधारा की राजनीति से कटा हुआ था। कालिता की इस सफलता ने जमीनी कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा भर दी है।
सादगी की मिसाल: जीत के अगले दिन भी किया घर का काम
अकसर देखा जाता है कि चुनाव जीतने के बाद नेताओं के ठाट-बाट बदल जाते हैं, लेकिन कालिता ने अपनी सादगी से सबका दिल जीत लिया। सोमवार देर रात जीत का प्रमाण पत्र मिलने के बाद जब वह घर लौटीं, तो उन्होंने कोई आलीशान दावत नहीं बल्कि अपनी सास के हाथ का बना ‘आलू-पोटोलर झोल’ (आलू-परवल की सब्जी) खाया।
इतना ही नहीं, विधायक बनने के अगले ही दिन यानी मंगलवार को वह किसी सेलिब्रिटी की तरह मीडिया में व्यस्त होने के बजाय अपने घर के कपड़े धोने और घरेलू कामकाज निपटाने में जुटी रहीं। मंगलवार को उनका व्रत था, इसलिए उन्होंने पूरा दिन निर्जला बिताया। उनके लिए यह जीत सत्ता का सुख नहीं, बल्कि अपने जैसे गरीब लोगों की सेवा करने का एक माध्यम है।
शपथ ग्रहण के लिए नहीं थी साड़ी, मालिक ने बढ़ाया हाथ
कालिता के पास कोलकाता में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह के लिए कोई बढ़िया साड़ी तक नहीं थी। उन्होंने बड़ी मासूमियत से स्वीकार किया कि वह अपनी आर्थिक स्थिति को अच्छी तरह जानती हैं और उनके पास इस खास अवसर के लिए उपयुक्त वस्त्र नहीं हैं। यह सुनकर उनके मालिक कृष्णा पात्रा भावुक हो गए, जिनके घर कालिता पिछले 20 सालों से काम कर रही हैं। उन्होंने तुरंत फैसला किया कि वह अपनी इस ‘पारिवारिक सदस्य’ को एक सुंदर साड़ी उपहार में देंगे।
पश्चिम बंगाल में इस बार बीजेपी ने 206 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है और टीएमसी के 15 साल पुराने गढ़ को ढहा दिया है। लेकिन इस बड़ी राजनीतिक हलचल के बीच कालिता मांझी जैसी महिला का विधायक बनना लोकतंत्र के उस स्वरूप को दर्शाता है, जहां एक सामान्य नागरिक भी सत्ता के शीर्ष तक पहुंच सकता है।


