पश्चिम बंगाल में चुनावी शोर थमने और नतीजे आने के बाद अब एक नए किस्म का कानूनी और सियासी घमासान शुरू होता दिख रहा है। यह पूरा विवाद ‘एसआईआर’ यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है। राज्य की कम से कम 25 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां हार-जीत का जो अंतर रहा, उससे कहीं ज्यादा संख्या उन मतदाताओं की है जिन्हें चुनाव आयोग ने एसआईआर के तहत वोटिंग से ठीक पहले ‘अयोग्य’ करार देकर लिस्ट से बाहर कर दिया था। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन सीटों पर फिर से मतदान की नौबत आ सकती है? यह आशंका इसलिए भी प्रबल है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान एक बेहद अहम टिप्पणी की थी, जिसने कई दिग्गजों की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
SIR का गणित: जब जीत का अंतर पड़ा छोटा
केंद्रीय चुनाव आयोग ने बंगाल चुनाव से पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के जरिए करीब 27 लाख मतदाताओं को अयोग्य पाया था और उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए थे। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस का दावा इससे कहीं बड़ा है; पार्टी का कहना है कि लगभग 34 लाख वोटरों के नाम गलत तरीके से काटे गए। आंकड़ों का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि दो दर्जन से अधिक सीटों पर जीत का मार्जिन इन काटे गए वोटों की तुलना में बहुत कम है।
इस मामले में सबसे चर्चित नाम ममता बनर्जी की पारंपरिक सीट भवानीपुर का है। यहां बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी ने करीब 15,000 वोटों से जीत दर्ज की है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इसी सीट पर चुनाव आयोग ने एसआईआर के तहत 28,000 मतदाताओं के नाम काट दिए थे। यानी अगर ये वोटर सूची में होते और मतदान करते, तो नतीजे की तस्वीर कुछ और भी हो सकती थी।
इन सीटों पर फंसा है सबसे पेचीदा पेंच
सिर्फ भवानीपुर ही नहीं, ऐसी सीटों की फेहरिस्त लंबी है। चंपदानी सीट पर बीजेपी के दिलीप सिंह ने मात्र 3,026 वोटों से जीत हासिल की, जबकि वहां 7,600 से ज्यादा वोटर्स को अयोग्य घोषित किया गया था। करंदीघी सीट पर बीजेपी की जीत का अंतर लगभग 19,000 रहा, जबकि वहां 31,000 से ज्यादा नाम काटे गए थे। मुर्शिदाबाद की जंगीपुर सीट पर भी यही हाल रहा, जहां 10,500 की जीत के मुकाबले 36,000 से ज्यादा लोग अयोग्य पाए गए थे।
मोंटेश्वर, हेमताबाद और बाली जैसी सीटों पर भी कमोवेश यही स्थिति देखने को मिल रही है। बाली सीट का मामला तो पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में है, जहां बीजेपी 11,997 वोटों से जीती है और अयोग्य पाए गए वोटरों की संख्या 11,386 है। समसेरगंज और मानिकचक जैसी सीटों पर भी अयोग्य वोटरों की भारी संख्या ने चुनावी नतीजों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
जमीनी हकीकत: मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर का हाल
मुर्शिदाबाद जिले में एसआईआर की मार सबसे ज्यादा देखने को मिली, जहां अकेले 4 लाख से ज्यादा वोट डिलीट किए गए। जिले की 22 सीटों में से बीजेपी और तृणमूल के बीच कांटे की टक्कर रही, जबकि पिछले चुनाव में यहां तृणमूल का लगभग एकतरफा कब्जा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन जिलों में बीजेपी को तृणमूल से कम सीटें मिलीं, वहां भी एसआईआर ने वोटों के ध्रुवीकरण और समीकरणों को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। दक्षिण 24 परगना और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में भी वोट कटने का असर नतीजों पर साफ तौर पर महसूस किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और भविष्य की संभावना
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा मोड़ जस्टिस जे बागची की वह टिप्पणी है, जो उन्होंने 23 अप्रैल को सुनवाई के दौरान की थी। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए पूछा था कि यदि किसी सीट पर जीत का मार्जिन महज 2 प्रतिशत हो और 15 प्रतिशत लोग वोट डालने से वंचित रह जाएं, तो उस स्थिति को गंभीरता से देखना होगा। कानूनी जानकारों का मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस तर्क को आधार बनाता है, तो उन सीटों पर दोबारा चुनाव या कानूनी समीक्षा की मांग जोर पकड़ सकती है जहां ‘मार्जिन’ से ज्यादा ‘वोट’ काटे गए। अब सबकी नजरें तृणमूल कांग्रेस के अगले कदम और शीर्ष अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो बंगाल की सत्ता के भविष्य की नई इबारत लिख सकता है।


