पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने अदालत में दाखिल अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दायर की गईं 16.10 लाख अपीलें कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत की गईं। आयोग के मुताबिक, ये अपीलें उसके नाम पर सीधे आयोग के कार्यालय ने नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय के अधिकारियों ने अपने वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए दायर की थीं। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि इतनी बड़ी संख्या में अपीलें दाखिल करने का फैसला किसने लिया और इसके लिए आधिकारिक मंजूरी किस स्तर पर दी गई। इस मामले में अब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों की पारदर्शिता पर बहस तेज हो गई है।
16.10 लाख अपीलों पर विवाद, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?
चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल किया। इसमें आयोग ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दायर 16.10 लाख अपीलों को उचित ठहराया।
यह मामला राकेश कुमार सिंह उर्फ राकेश सिंह बनाम भारत संघ एवं अन्य नाम से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने SIR से संबंधित 14 कथित एकतरफा फैसलों को चुनौती दी है। उनका आरोप है कि इन फैसलों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद अकेले निर्णय लिए।
याचिका में खास तौर पर यह सवाल उठाया गया कि जब चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय है, तो उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले फैसले केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के नाम पर कैसे लिए जा सकते हैं?
मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का मुद्दा सीधे आम नागरिकों के मतदान के अधिकार से जुड़ा है। इसलिए यह विवाद केवल अधिकारियों के बीच निर्णय लेने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। इसका असर इस बात पर भी पड़ सकता है कि मतदाता सूची से जुड़े विवादों की जांच और सुनवाई किस तरह की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला देकर आयोग ने दी सफाई
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के 1 अप्रैल और 6 अप्रैल 2026 के आदेशों का उल्लेख किया। ये आदेश पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान न्यायिक अधिकारियों द्वारा लिए गए फैसलों के खिलाफ अपीलों से संबंधित थे।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले निर्देश दिया था कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से प्रभावित लोगों के साथ-साथ उन मामलों में भी अपील की जा सकती है, जहां चुनाव आयोग के अधिकारी मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल किए जाने से असहमत हों।
अदालत ने अपीलीय न्यायाधिकरणों को यह भी निर्देश दिया था कि वे संबंधित मामलों में उपलब्ध पूरे रिकॉर्ड की जांच करें। इसमें न्यायिक अधिकारियों द्वारा दिए गए फैसलों के कारण भी शामिल हैं। साथ ही, प्रभावित पक्षों को अपनी बात रखने का उचित अवसर देने और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार प्रक्रिया अपनाने को कहा गया था।
आयोग का तर्क है कि इन्हीं निर्देशों के संदर्भ में संबंधित अधिकारियों ने अपीलें दाखिल कीं। उसके मुताबिक, ये अपीलें लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत अधिकृत अधिकारियों ने अपने वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए दायर की थीं।
इस तरह आयोग ने अपने जवाब में अपीलों को अदालत के निर्देशों और कानूनी प्रावधानों से जोड़कर देखा है। हालांकि, इन दलीलों पर अंतिम न्यायिक निर्णय आना अभी बाकी है।
किसने दी अपील दाखिल करने की मंजूरी? याचिका में उठे सवाल
इस मामले में विवाद का एक बड़ा पहलू अपील दाखिल करने की प्रक्रिया और उसके प्राधिकरण से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, 12 अगस्त 2026 को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू की एक नोटिंग में सवाल उठाया गया था कि चुनाव आयोग की ओर से ये अपीलें दाखिल करने के लिए किस अधिकारी को अधिकृत किया गया था और इसकी मंजूरी किसने दी थी।
याचिका में संबंधित आदेशों, अनुमोदनों और निर्णय लेने से जुड़े मूल रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश करने की मांग की गई है।
हालांकि, चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि मतदाता सूची से जुड़े काम के लिए मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO), निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (AERO) कानून के तहत जिम्मेदार अधिकारी हैं।
आयोग के मुताबिक, 22 अक्टूबर 2026 को उसे पश्चिम बंगाल के CEO कार्यालय से एक पत्र मिला था। इसमें बताया गया कि संबंधित अधिकारियों ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अधिकृत अधिकारी के रूप में अपीलें दाखिल की थीं। आयोग ने यह भी कहा कि ये मामले उसके समक्ष निर्णय के लिए नहीं लाए गए थे।
यानी चुनाव आयोग का पक्ष है कि अपीलों के लिए हर मामले में आयोग के स्तर पर अलग से फैसला होना जरूरी नहीं था, क्योंकि संबंधित अधिकारियों ने अपने वैधानिक अधिकारों के तहत कार्रवाई की। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता निर्णय लेने की प्रक्रिया और उसकी वैधता की जांच चाहता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग भी, अब अदालत के फैसले पर नजर
याचिका में केवल 16.10 लाख अपीलों के अधिकार और प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी गई है। इसमें यह घोषणा करने की भी मांग की गई है कि चुनाव आयोग जैसे बहुसदस्यीय निकाय के अधिकार क्षेत्र वाले फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले नहीं ले सकते।
इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने आयोग के मूल रिकॉर्ड पेश करने और मामले की सुनवाई पूरी होने तक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग भी की है।
चुनाव आयोग ने अपने जवाब में कहा कि SIR से जुड़े फैसले संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित 2023 के कानून की धारा 18 के तहत लिए गए।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि बैठकों के दौरान अलग-अलग आयुक्तों की टिप्पणियां, सुझाव या सवाल अपने आप में आयोग के अंतिम फैसले नहीं माने जा सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर 5 अक्टूबर 2026 को नोटिस जारी किया था। उस समय अदालत ने प्रतिवादियों का जवाब आने से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने की मांग स्वीकार नहीं की थी।
अब इस मामले में अहम सवाल यह है कि अदालत चुनाव आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों के अधिकारों को किस तरह परखती है। आम मतदाताओं के लिए इसका महत्व इसलिए भी है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम शामिल होने या हटने से उनके मतदान के अधिकार पर सीधा असर पड़ता है। हालांकि, फिलहाल 16.10 लाख अपीलों की वैधता या याचिका में लगाए गए आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले की प्रतीक्षा है।
केस का नाम: Rakesh Kumar Singh alias Rakesh Singh v. Union of India & Ors.

