लोकसभा की सीटें 543 से 850 करने की तैयारी? जानिए क्या है परिसीमन विधेयक और क्यों जुटा है दो-तिहाई बहुमत का गणित

लोकसभा की सीटें 543 से 850 करने की तैयारी? जानिए क्या है परिसीमन विधेयक और क्यों जुटा है दो-तिहाई बहुमत का गणित

देश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा मुद्दा चर्चा के केंद्र में है, जिसका असर आने वाले दशकों तक भारतीय लोकतंत्र और चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है। यह मुद्दा है परिसीमन (Delimitation) विधेयक। लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्गठन से जुड़े इस प्रस्ताव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नई राजनीतिक लड़ाई शुरू होती दिखाई दे रही है।

इसी बीच विभिन्न विपक्षी दलों में टूट और राजनीतिक अस्थिरता की चर्चाओं ने इस बहस को और तेज कर दिया है। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार संसद में इस महत्वपूर्ण विधेयक को दोबारा लाने की रणनीति पर काम कर रही है, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत बेहद जरूरी होगा।

आखिर क्या है परिसीमन और क्यों है इतना अहम?

परिसीमन का मतलब है जनसंख्या में बदलाव के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों की संख्या का पुनर्निर्धारण करना। संविधान के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद यह प्रक्रिया होनी चाहिए, ताकि हर सांसद लगभग समान संख्या के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करे।

लेकिन 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगा दी गई थी। बाद में यह रोक बढ़ाते हुए 2026 तक कर दी गई। अब यह समयसीमा समाप्ति की ओर बढ़ रही है, इसलिए परिसीमन का मुद्दा फिर से राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।

सरकार का तर्क है कि देश की आबादी पिछले पांच दशकों में कई गुना बढ़ चुकी है। कई सांसदों के संसदीय क्षेत्रों में 40 से 50 लाख तक मतदाता हैं, जिससे प्रभावी प्रतिनिधित्व प्रभावित होता है। ऐसे में सीटों की संख्या बढ़ाना आवश्यक हो सकता है।

दक्षिण भारत क्यों जता रहा है चिंता?

परिसीमन को लेकर सबसे बड़ा विवाद उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संतुलन को लेकर है।

तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों का कहना है कि उन्होंने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश, बिहार और कुछ अन्य राज्यों में आबादी अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ी।

यदि नई सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो उत्तर भारत के राज्यों को अधिक लोकसभा सीटें मिल सकती हैं। दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव कम हो जाएगा और संसद में शक्ति संतुलन बदल सकता है।

संसद में पहले क्यों अटक गया था मामला?

इस मुद्दे से जुड़ा एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम अप्रैल 2026 में देखने को मिला था। सरकार संविधान संशोधन से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधेयक को पारित नहीं करा सकी थी।

ऐसे संशोधन के लिए संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। उस समय सरकार आवश्यक संख्या जुटाने में असफल रही और विपक्ष ने एकजुट होकर विरोध किया।

विपक्षी दलों का आरोप था कि महिला आरक्षण और चुनावी सुधारों के साथ परिसीमन को जोड़कर सरकार देश का राजनीतिक समीकरण बदलना चाहती है। नतीजतन प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

अब क्यों बढ़ी राजनीतिक हलचल?

हाल के दिनों में कई विपक्षी दलों के भीतर असंतोष और संभावित टूट की खबरें सामने आई हैं। इसी वजह से राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि कुछ विपक्षी सांसद मतदान से दूर रहते हैं या पक्ष बदलते हैं, तो संसद में बहुमत का गणित बदल सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में परिसीमन से जुड़ा कोई बड़ा संविधान संशोधन दोबारा आता है, तो उसके लिए केवल संख्याबल ही नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति भी जरूरी होगी।

क्योंकि यह केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का सवाल नहीं है, बल्कि भारत के संघीय ढांचे, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और भविष्य की चुनावी राजनीति को प्रभावित करने वाला विषय माना जा रहा है।

फिलहाल सरकार की ओर से किसी नए विधेयक को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन परिसीमन को लेकर बहस आने वाले समय में और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।