सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने देश की शीर्ष अदालत में जजों की नियुक्ति के एक ऐसे पहलू पर सवाल उठाया है, जिस पर अब तक बहुत कम चर्चा हुई है। उन्होंने कहा कि संविधान में ‘Distinguished Jurist’ यानी प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने का प्रावधान मौजूद है, लेकिन संविधान लागू होने के 76 साल से ज्यादा समय बाद भी इसका इस्तेमाल नहीं हुआ। जस्टिस भुइयां के मुताबिक, यह अफसोस की बात है कि संविधान का यह प्रावधान अब तक निष्क्रिय बना हुआ है।
उन्होंने यह बात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली में LLM कार्यक्रम के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कही। उनके मुताबिक, अगर किसी प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ को बेंच में जगह मिलती है तो उसकी अकादमिक विशेषज्ञता और शोध का अनुभव संवैधानिक और सार्वजनिक कानून से जुड़े मामलों में अदालत के काम आ सकता है।
76 साल बाद भी ‘Distinguished Jurist’ को मौका क्यों नहीं?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट में ऐसे कानून विशेषज्ञों की नियुक्ति की संभावना को ध्यान में रखा था, जो जरूरी नहीं कि पारंपरिक तौर पर जज या प्रैक्टिसिंग वकील रहे हों।
लेकिन अब तक आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियां हाईकोर्ट के वरिष्ठ जजों या मुख्य न्यायाधीशों में से होती रही हैं। कुछ मौकों पर बार से सीधे नियुक्तियां भी हुई हैं और जस्टिस भुइयां के मुताबिक इनमें से कई नियुक्तियां बेहतरीन साबित हुईं।
इसके बावजूद कानून की अकादमिक दुनिया से किसी प्रतिष्ठित शिक्षाविद या ज्यूरिस्ट को सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जगह नहीं मिली।
जस्टिस भुइयां ने इसके पीछे दो संभावित वजहें बताईं। पहली संभावना यह है कि केंद्र सरकार और बाद में कॉलेजियम ने शायद भारतीय कानूनी शिक्षाविदों को इस भूमिका के लिए पर्याप्त गहराई वाला नहीं माना। दूसरी और उनके मुताबिक ज्यादा संभावित वजह यह हो सकती है कि इस संवैधानिक प्रावधान पर सरकार और कॉलेजियम ने अब तक गंभीरता से विचार ही नहीं किया।
उन्होंने इसे संविधान के उन प्रावधानों में से एक बताया, जिनका अब तक इस्तेमाल नहीं किया गया है।
‘व्यावहारिक अनुभव नहीं है’ वाली दलील को बताया सतही
जस्टिस भुइयां ने उस तर्क को भी खारिज किया कि किसी कानून के प्रोफेसर या शिक्षाविद के पास अदालत में व्यावहारिक काम का पर्याप्त अनुभव नहीं होता।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ देश की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था नहीं है। यह भारत की कानूनी, संवैधानिक और नैतिक चेतना का महत्वपूर्ण संरक्षक भी है। इसलिए बेंच में अलग तरह की विशेषज्ञता रखने वाले लोगों की मौजूदगी उपयोगी हो सकती है।
उनके अनुसार, प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ अपनी अकादमिक समझ के कारण केवल तकनीकी कानूनी पेचीदगियों तक सीमित नहीं रहेंगे। सार्वजनिक कानून और संवैधानिक सवालों को व्यापक नजरिए से समझने में उनकी विशेषज्ञता अदालत के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
जस्टिस भुइयां ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘Distinguished Jurist’ की कोई एक तय और संकीर्ण परिभाषा नहीं है। इसका दायरा कानून की प्रैक्टिस, अध्यापन और शोध से जुड़े प्रतिष्ठित लोगों तक हो सकता है।
किसी व्यक्ति को प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ मानने के लिए उसका अदालत में नियमित तौर पर वकालत करना अनिवार्य नहीं होना चाहिए।
अमेरिका और दूसरे देशों में अलग मॉडल का उदाहरण
जस्टिस भुइयां ने दूसरे देशों की न्यायिक व्यवस्था का उदाहरण भी दिया। उन्होंने बताया कि अमेरिका में संघीय अदालत का जज बनने के लिए औपचारिक लॉ डिग्री की शर्त भी उसी तरह नहीं है जैसी भारत में दिखाई देती है।
उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इतिहास से फेलिक्स फ्रैंकफर्टर, सैमुअल मिलर और रूथ बेडर गिन्सबर्ग जैसे नामों का उदाहरण दिया। फ्रैंकफर्टर हार्वर्ड में कानून के प्रोफेसर रहे थे। सैमुअल मिलर चिकित्सक थे, जबकि गिन्सबर्ग ने कानून और अकादमिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने ग्रेट ब्रिटेन, कनाडा और केन्या का भी उल्लेख किया, जहां कानूनी शिक्षाविदों के शीर्ष अदालतों में जज बनने की संभावना मौजूद है।
क्या भारतीय न्यायपालिका में बदल सकता है नजरिया?
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी का मूल सवाल यही है कि क्या सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जजों के साथ-साथ कानून के क्षेत्र के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं के अनुभव का भी इस्तेमाल किया जा सकता है?
संविधान के अनुच्छेद 124(3) में ‘Distinguished Jurist’ की श्रेणी का प्रावधान है। जस्टिस भुइयां का मानना है कि इस शब्द का अर्थ केवल वकील और जज तक सीमित करना सही नहीं होगा। कानून के क्षेत्र में गहरी विशेषज्ञता रखने वाला व्यक्ति भी इसके दायरे में आ सकता है।
उनकी टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है जब देश में न्यायिक नियुक्तियों, कॉलेजियम और न्यायपालिका में अलग-अलग तरह की विशेषज्ञता के प्रतिनिधित्व पर चर्चा होती रहती है।
फिलहाल जस्टिस भुइयां ने किसी विशेष व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की बात नहीं कही है। उनका जोर इस बात पर है कि संविधान ने जो रास्ता पहले से खोल रखा है, उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। अगर कभी इस प्रावधान का इस्तेमाल होता है, तो इससे सुप्रीम कोर्ट की बेंच में अकादमिक कानून विशेषज्ञता के लिए भी एक नया रास्ता खुल सकता है।



