अयोध्या विवाद: फैसला टालने का हो सकता है उल्टा नतीजा !

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Ayodhya dispute: The decision can be avoided in the opposite result!

लखनऊ: ये मामला साल 1992 का है. विश्व हिंदू परिषद ने 6 दिसंबर को अयोध्या के विवादित परिसर में प्रतीकात्मक कारसेवा करने का एलान किया. इसकी मंजूरी के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से गुजारिश की गई, लेकिन इस अर्जी पर तीन जजों की बेंच में से एक जज ने फैसला नहीं लिखवाया. ऐसे में बेंच का फैसला अटका रहा और 6 दिसंबर को बाबरी ढांचा ढहा दिया गया. ये वाकया आज इसलिए भी प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के जन्मस्थान संबंधी टाइटल सूट की सुनवाई जनवरी 2019 तक टाल दी है.

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हुआ यूं था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में तत्कालीन जस्टिस एससी माथुर, जस्टिस ब्रजेश कुमार और जस्टिस सैयद हैदर अब्बास रजा की बेंच के सामने प्रतीकात्मक कारसेवा की मंजूरी के लिए अर्जी दाखिल हुई. बेंच के दो जजों एससी माथुर और ब्रजेश कुमार ने तो प्रतीकात्मक कारसेवा की मंजूरी का फैसला लिखवा दिया, लेकिन जस्टिस हैदर अब्बास रजा ने अपना फैसला लंबे समय तक नहीं लिखा. पहले अयोध्या मामले की सुनवाई के लिए 21 जुलाई 1989 को तत्कालीन कार्यवाहक चीफ जस्टिस केसी अग्रवाल, जस्टिस यूसी श्रीवास्तव और जस्टिस सैयद हैदर अब्बास रजा की विशेष बेंच थी, लेकिन जस्टिस अग्रवाल और जस्टिस श्रीवास्तव के हटने के बाद जस्टिस एससी माथुर और जस्टिस ब्रजेश कुमार की जस्टिस रजा के साथ बेंच बनाई गई थी.

जस्टिस रजा ने अपना फैसला 6 दिसंबर 1992 को ढांचा गिरने के बाद लिखवाया. खास बात ये कि उस फैसले में कोई कानूनी राय नहीं थी. तमाम कानूनविदों ने उस वक्त कहा था कि अगर जस्टिस रजा ने भी वक्त पर अपना फैसला लिखवा दिया होता, तो शायद कारसेवकों का गुस्सा न भड़कता और अयोध्या में मौजूद लोग प्रतीकात्मक कारसेवा करके ही चले गए होते. बता दें कि हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अयोध्या में राम मंदिर बनवाने के लिए केंद्र की मोदी सरकार से कानून बनाने का आग्रह किया है. वहीं, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी 28 अक्टूबर 2018 को कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस मसले पर जल्दी फैसला सुनाना चाहिए.

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हिंदूवादी संगठन और उनके नेता लगातार कह रहे थे कि सर्वोच्च अदालत को रोजाना सुनवाई करके मामले को निपटाना चाहिए. मुस्लिम पक्षकारों की कोशिश सुनवाई टलवाने की है, जिसे अनसुना किया जाए. सुनवाई जनवरी 2019 तक टलने के बाद जो प्रतिक्रियाएं सामने आयी हैं वो उनके गुस्से को जाहिर कर रही हैं. भाजपा नेता विनय कटियार ने कहा है कि कांग्रेस नेता और मुस्लिम पक्षकारों के अधिवक्ता कपिल सिब्बल जो चाह रहे थे वही हो गया. जबकि बहुसंख्यक जनता चाह रही थी कि प्रतिदिन सुनवाई होकर जल्द फैसला सामने आए. उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिपण्णी नहीं करना चाहते हैं, मगर अच्छा संकेत नहीं है.

हिंदू महासभा के स्वामी चक्रपाणी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में श्रीराम मन्दिर का केस जनवरी तक लंबित होने के कारण अब मोदी सरकार तत्काल कानून बनाना चाहिए. जबकि साध्वी प्राची ने कहा है कि जिस तरह बाबरी मस्जिद का ढांचा टूटा था, वैसे ही राम मंदिर का निर्माण भी होगा. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट के अगले साल जनवरी तक सुनवाई टालने को बीजेपी और हिंदूवादी संगठन बड़ा मुद्दा बना सकते हैं.

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