सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान वकील अश्विनी उपाध्याय को कोर्ट से ऐसी सलाह मिली, जिसने पूरी सुनवाई की दिशा ही बदल दी। मामला 14 साल तक के बच्चों को सेक्युलर या धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के रजिस्ट्रेशन, मान्यता, निगरानी और मॉनिटरिंग से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपाध्याय के पक्ष में पहले ही आदेश मौजूद है, इसलिए बार-बार नई रिट याचिका दायर करने के बजाय अवमानना याचिका का रास्ता अपनाना चाहिए। जस्टिस अरविंद कुमार ने यहां तक कहा कि उन्हें अपना ही अच्छा केस खराब नहीं करना चाहिए। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अश्विनी उपाध्याय ने अपनी मौजूदा याचिका वापस ले ली।
पहले क्या हुआ था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने दिलाया ध्यान?
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने याद दिलाया कि अश्विनी उपाध्याय इस मुद्दे पर पहले भी सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुके हैं। उस समय कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे उनकी ओर से दी गई अर्जी पर निर्धारित समय के भीतर विचार करें।
कोर्ट ने इसके लिए ‘रिट ऑफ मैंडमस’ जारी किया था। इसके तहत अधिकारियों को दो महीने के भीतर उनकी अर्जी पर विचार करने का निर्देश दिया गया था।
उपाध्याय ने कोर्ट को बताया कि दो महीने की अवधि गुजरने के बाद भी अधिकारियों ने उनकी अर्जी पर कोई फैसला या विचार नहीं किया। उन्होंने कहा कि तीन महीने बीत चुके हैं और इसके बावजूद संबंधित स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई। इसी वजह से उन्होंने एक और रिट याचिका दाखिल की थी।
यहीं से सुनवाई ने नया मोड़ लिया।
कोर्ट ने कहा- नई रिट नहीं, अवमानना का रास्ता अपनाइए
जस्टिस अरविंद कुमार ने पूछा कि जब कोर्ट पहले ही अधिकारियों को कार्रवाई का निर्देश दे चुका है और उस आदेश का पालन नहीं हुआ, तो ऐसी स्थिति में उचित कानूनी रास्ता क्या होना चाहिए।
उपाध्याय ने बताया कि इसी वजह से उन्होंने नई रिट याचिका दाखिल की है। इस पर जस्टिस कुमार ने साफ कहा कि यह रास्ता उचित नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि तीसरी रिट याचिका शुरुआती स्तर पर ही खारिज हो सकती है।
इसके बजाय कोर्ट ने उन्हें अवमानना याचिका दाखिल करने की सलाह दी। यानी अगर पहले से जारी न्यायिक आदेश का पालन नहीं हुआ है, तो उसी आदेश के अनुपालन से जुड़े मामले को अवमानना के जरिए कोर्ट के सामने रखा जा सकता है।
जस्टिस कुमार ने कहा कि इसके बाद सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई करेगा।
TET और अल्पसंख्यक संस्थानों का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान अश्विनी उपाध्याय ने मामले से जुड़े कुछ दूसरे संवैधानिक सवाल भी उठाने की कोशिश की। इनमें संविधान के अनुच्छेद 26 और 30 से जुड़े मुद्दे तथा अल्पसंख्यक संस्थानों में शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET लागू करने का सवाल शामिल था।
हालांकि, कोर्ट ने इन मुद्दों को मौजूदा याचिका से अलग बताया। जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि इन सवालों का वर्तमान मामले से सीधा संबंध नहीं है।
कोर्ट का जोर इस बात पर रहा कि जिस मुद्दे पर पहले ही उपाध्याय के पक्ष में आदेश पारित हो चुका है, पहले उसके अनुपालन का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। दूसरे मुद्दों को उसी याचिका में जोड़ने से मामला अनावश्यक रूप से व्यापक हो सकता है।
‘सेल्फ-गोल’ से बचने की कोर्ट की नसीहत
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार की एक टिप्पणी खास तौर पर चर्चा में रही। उन्होंने कहा कि किसी को भी ‘सेल्फ-गोल’ नहीं करना चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले ही अधिकार लागू कराने के लिए आदेश मिल चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि नया आदेश कैसे लिया जाए, बल्कि यह है कि पहले से जारी आदेश का पालन कैसे कराया जाए।
जस्टिस कुमार ने हल्के अंदाज में यह भी कहा कि कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमिटी के सदस्य के तौर पर उन्हें मुफ्त में सलाह दे रहा है।
आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने अश्विनी उपाध्याय को मौजूदा रिट याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। आदेश में यह दर्ज किया गया कि याचिका वापस लेने की छूट के साथ उन्हें उचित कानूनी कदम उठाने की स्वतंत्रता है।
इस तरह सुनवाई का तत्काल नतीजा किसी नए निर्देश के रूप में नहीं आया, बल्कि कोर्ट ने मामले को आगे बढ़ाने के लिए अवमानना याचिका का रास्ता स्पष्ट कर दिया। अब इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई इसी दिशा में बढ़ सकती है।



