पार्टनरशिप खत्म होते ही जमीन की कीमत फिक्स नहीं होगी! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, असेसमेंट के वक्त की वैल्यू पर मिलेगा हिस्सा

पार्टनरशिप खत्म होते ही जमीन की कीमत फिक्स नहीं होगी! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, असेसमेंट के वक्त की वैल्यू पर मिलेगा हिस्सा

पार्टनरशिप फर्म में किसी पार्टनर का हिस्सा सिर्फ इस आधार पर तय नहीं किया जा सकता कि फर्म किस तारीख को खत्म हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि पार्टनरशिप खत्म होने की तारीख और फर्म की संपत्ति में पार्टनर के हिस्से की मौद्रिक कीमत तय होने की तारीख अलग हो सकती है। पार्टनर को संपत्ति की वास्तविक वैल्यूएशन के समय उसकी कीमत के आधार पर अपने हिस्से का हक मिल सकता है।

यह फैसला उन कारोबारियों और पार्टनरशिप फर्मों के लिए खास मायने रखता है, जहां फर्म के पास जमीन, मकान या दूसरी बड़ी अचल संपत्तियां हैं। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने हैदराबाद की 3.27 एकड़ जमीन से जुड़े विवाद में यह महत्वपूर्ण बात कही है।

विवाद में सवाल था कि पार्टनर का हिस्सा 18 अक्टूबर 1983, यानी फर्म के विघटन की तारीख के हिसाब से तय किया जाए या बाद में संपत्ति के वास्तविक असेसमेंट अथवा बिक्री के समय उसकी जो वैल्यू थी, उसके आधार पर।

फर्म बंद होने की तारीख और संपत्ति की कीमत अलग-अलग क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि पार्टनरशिप खत्म होने की तारीख का महत्व मुख्य रूप से उस तारीख तक के मुनाफे और नुकसान का हिसाब लगाने के लिए है। इसका यह मतलब नहीं है कि उसी दिन फर्म की अचल संपत्ति की कीमत भी हमेशा के लिए तय हो गई।

कोर्ट ने कहा कि 18 अक्टूबर 1983 को यह निर्धारित किया जा सकता है कि उस तारीख तक फर्म को कितना फायदा या नुकसान हुआ। लेकिन पार्टनर को बची हुई संपत्ति में उसके हिस्से की वास्तविक आर्थिक कीमत कब और कैसे मिलेगी, यह अलग सवाल है।

यानी अगर किसी पार्टनरशिप के पास जमीन जैसी संपत्ति है और फर्म खत्म होने के बाद उसका मूल्य काफी बदल जाता है, तो केवल विघटन की पुरानी तारीख को आधार बनाकर पार्टनर का हिस्सा तय नहीं किया जा सकता।

पार्टनरशिप खत्म हुई तो जमीन का क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फर्म के विघटन के बाद उसकी संपत्तियों के साथ मनमाने तरीके से आगे नहीं बढ़ा जा सकता। सामान्य स्थिति में फर्म की संपत्तियों को बेचकर या नकद में बदलकर उसके बाद रकम को पार्टनरों के बीच उनके अधिकार के मुताबिक बांटना होता है।

हालांकि, इसमें एक रास्ता यह हो सकता है कि बचे हुए पार्टनर आपसी सहमति से जाने वाले पार्टनर के हिस्से की मार्केट वैल्यू चुका दें। ऐसी स्थिति में संपत्ति को बेचने की जरूरत नहीं पड़ सकती।

लेकिन अगर कोई समझौता नहीं होता, तो फर्म की संपत्ति को बेचकर उसकी रकम का हिसाब करना और पार्टनरों के हिस्से के मुताबिक भुगतान करना जरूरी होगा।

यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टनरशिप खत्म होने के बाद किसी एक पक्ष को पुरानी फर्म की संपत्ति अपने पास रखकर कारोबार जारी रखने का एकतरफा अधिकार नहीं मिल जाता।

नई फर्म पुरानी फर्म की जमीन नहीं रख सकती

मामले में एक अहम सवाल यह भी था कि पुरानी पार्टनरशिप खत्म होने के बाद कुछ पार्टनर नई साझेदारी बनाकर उसी कारोबार और संपत्ति का इस्तेमाल जारी रख सकते हैं या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि नई बनी पार्टनरशिप पुरानी फर्म के संपत्ति अधिकारों का निपटारा किए बिना उसकी जमीन अपने पास रख सकती है।

कोर्ट ने साफ किया कि विवादित जमीन M/s Viraj Constructions नाम की पुरानी पार्टनरशिप की संपत्ति थी। नई पार्टनरशिप उस जमीन को तभी अपने पास रख सकती थी, जब वह उसे पुरानी फर्म से बाकायदा हासिल करती या पुराने पार्टनर के अधिकार का निपटारा करती।

कोर्ट के मुताबिक, ऐसा नहीं किया गया। इसलिए नई पार्टनरशिप द्वारा जमीन को अपने पास रखना कानूनी रूप से सही नहीं था।

कारोबारियों के लिए फैसले का सीधा मतलब

इस फैसले का असर खास तौर पर उन पार्टनरशिप कारोबारों में समझा जा सकता है, जहां जमीन या दूसरी महंगी संपत्तियां फर्म की बैलेंस शीट का बड़ा हिस्सा होती हैं। किसी पार्टनर के अलग होने या फर्म के खत्म होने पर केवल पुरानी तारीख की संपत्ति कीमत देखकर हिसाब बंद कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी अंतर को स्पष्ट किया है। विघटन की तारीख मुनाफे-नुकसान का हिसाब तय कर सकती है, लेकिन संपत्ति में पार्टनर के हिस्से की आर्थिक वैल्यू उसी तारीख पर हमेशा फिक्स नहीं हो जाती।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

यह फैसला V. Sumitra Reddy & Anr. v. K. Ranganadha Reddy & Ors. मामले में आया है और पार्टनरशिप फर्म की संपत्ति के बंटवारे तथा पार्टनर के आर्थिक अधिकारों को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।