यूपी में शिक्षकों की भर्ती के सीएम योगी के सपने पर पलीता लगा रहे अधिकारी

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Viplava Awasthi

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यूं तो उत्तर प्रदेश में शिक्षा की दुर्गति से सभी लोग भली भांति परिचित हैं लेकिन जब सूबे के मुख्यमंत्री बदलाव का संकल्प लें और उस पर भ्रष्ट अधिकारी पलीता लगा दें तो इसे व्यवस्था में मजबूत जकड़ बना चुकी संड़ाद न कहे तो और क्या कहा जाऐ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि उनकी सरकार प्रदेश में शिक्षकों की कमी को पूरी करेगी। इसके साथ ही मुख्यमंत्री योगी ने हाल के दिनों ही शासन को शिक्षकों की भर्ती किए जाने के निर्देश जारी भी किए थे। लेकिन प्रदेश में सरकार जरुर बदल गयी लेकिन शिक्षा को लेकर अधिकारियों की सोच ज्यों की त्यों बनी हुई है। मुख्यमंत्री योगी के 2017 में आने के बाद से पहले शिक्षकों की भर्तियां तो दूर जो हो भी रही हैं वो भ्रष्टाचार और धांधली की भेंट चढ़ रही हैं।

लगातार धांधली की शिकायत के चलते भर्तियों पर ग्रहण

योगी सरकार के आने के बाद हुई शिक्षकों सबसे बड़ी भर्ती अब सीबीआई की रडार पर पहुंच गयी है। 68 हजार 500 शिक्षकों की भर्तियों में भारी अनिमितता के चलते इलाहाबाद हाईकोर्ट को भर्ती की परीक्षा में हुई धांधली के चलते पूरे मामले की जांच सीबीआई को देनी पड़ी। आरोप था कि बड़े पैमाने पर उत्तर पुस्तिकाऐं बदल दी गयी। इसके साथ ही कई उत्तर पुस्तिकाओं के पहले पन्ने पर होने वाला बार कोड को बदल दिया गया जिसका अन्दर के पन्नों से मिलान करने पर गड़बड़ी साफ नजर आ गयी। हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में यूपी सरकार ने सीबीआई जांच का विरोध किया लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने माना कि यूपी सरकार की गठित तीन सदस्यीय जांच कमेटी भी इस धांधली को पकड़ने में असमर्थ हो गयी है।

भर्ती ही रद्द कर दी गयी

बोर्ड ऑफ बेसिक एजूकेशन ने 12460 बेसिक शिक्षकों की भर्ती की थी। इन शिक्षकों की भर्ती में नियमों की अनदेखी की शिकायत मिलने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ये भर्ती ही रद्द कर दी। हालांकि इन 12460 बेसिक शिक्षकों की भर्ती पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार के समय 2016 में शुरु हुई थी लेकिन 2018 में तय नियमों की अनदेखी के चलते ये भर्तियां रद्द कर दी गयी।

शिक्षामित्रों पर पहले ही गिर चुकी है गाज

साल 2015 में 1 लाख 37 हजार शिक्षामित्रों का समायोजन सहायक अध्यापक के तौर पर पहले ही रद्द किया जा चुका है। शिक्षामित्रों ने प्रदेश भर में आंदोलन किए। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा कि समायोजन रद्द करने से प्रभावित शिक्षामित्रों को यूपी सरकार द्वारा कराई जाने वाली अगली दो परिक्षाओं में शामिल किया जाना चाहिए। जिसमें उन्हें भारांक और आयु सीमा में छूट दी जानी चाहिए। 34 हजार शिक्षामित्र अगली परीक्षा में सम्मलित हुए जिसमें से केवल 7 हजार ही पास हो पाए। उनकी भी नियुक्तियां अधर में लटकी हैं।

TET परीक्षा का मुद्दा भी कोर्ट में धक्के खा रहा है

शिक्षकों की भर्ती के लिए की जाने वाली TET परीक्षा भी अदालतों के चक्कर काट रही है। 2018 में हुई टीईटी परीक्षा में प्रश्नों को लेकर विवाद शुरु हो गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने माना कि 14 प्रश्नों में गड़बड़ी हुई है जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट की डबल बैंच ने 3 प्रश्नों में गड़बड़ी की बात कही। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट की डबल बैंच के आदेश पर रोक लगाते हुए याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर दोबारा विचार करने का आदेश दिया।

TET परीक्षा के बाद भी भर्ती के लिए एक नई परीक्षा कराने से भर्ती फंस गयी है पेचदिंगियों में

शिक्षकों की भर्ती के लिए अभी तक टीईटी परीक्षा ही पूर्ण होती थी जिसके बाद से सहायक शिक्षकों की भर्ती की जाती रही है।  लेकिन योगी सरकार के आने के बाद से टीईटी परीक्षा के बाद भी सहायक शिक्षकों की भर्ती के लिए परीक्षा कराने का फैसला किया गया। दो परीक्षाओं में होने वाले भ्रष्टाचार और धांधलियों के चलते प्रदेश में शिक्षकों की भर्तियां हो ही नहीं पा रही। परीक्षाऐं या तो रद्द की जा रही हैं या उन पर अदालतों का डंडा चल रहा है।

यूपी सरकार ने 3 लाख शिक्षकों की जरुरत बताई थी

शिक्षामित्रों के मामले में सुनवाई के दौरान खुद यूपी सरकार ने माना था कि कम से कम 3 लाख शिक्षकों की भर्ती की जरुरत है। 1.37 लाख तो शिक्षामित्र ही एक झटके में बाहर हो गये बाकि भर्ती के लिए होने वाली परीक्षाओं पर भ्रष्टाचार और धांधली चल रही है।

जानकार क्या कहते हैं

यूपी में शिक्षामित्रों का मामला हो या सहायक शिक्षकों की भर्ती का, लगातार सुप्रीम कोर्ट में पेश हो रहे वकील आर के सिंह बताते हैं कि “ टीईटी के बाद सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा होनी ही नहीं चाहिए, क्योंकि एनसीटी ने इस तरह कि किसी व्यवस्था के बारे में कभी भी नहीं कहा, सरकार ने ये नियम बना कर और ज्यादा कन्फूजन पैदा कर दिया है, जो बच्चे टीईटी पास हैं उन्हें उनके क्वालीफिकेशन के आधार पर नं देकर चयन करना चाहिए था, सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा से केवल भर्ती जटिल हुई है, पारदर्शिता नहीं आयी।“

 

वहीं देश के जाने माने एजूकेशन एक्टीविस्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल कहते हैं कि “ शिक्षा में शिक्षक का रोल बहुत महत्तवपूर्ण है लेकिन दुख की बात ये है कि आज भी 10 करोड़ बच्चे स्कूलों के बाहर हैं, शिक्षकों की गुणवत्ता पर किसी सरकार का ध्यान नहीं है, ट्रैनिंग पाये शिक्षकों की स्कूलों में बेहद कमी है, 70-80 फीसदी राज्यों में शिक्षकों की हालत बदतर हैं बेसिक स्कूलों में , प्राईवेट ट्रैनिंग संस्थानों से केवल सर्टिफेकेट लेकर नौकरियां कर रहे हैं जबकि बच्चों को वो सही ट्रैनिंग नहीं दे पा रहे।“

 

वकील अशोक अग्रवाल

अशोक अग्रवाल कहते हैं कि “ सरकारों का कोई रुख गरीब बच्चों की शिक्षा पर नहीं है, राइट टू एजूकेशन उस वक्त बेमानी हो जाती है जब बच्चों को ट्रैंड टीचर नहीं मिल पाता, जो कि इस देश के विकास के लिए एक बड़ा सेटबैक है”।

अशोक अग्रवाल

 

 

 

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